श्रीमहादेव की धरती पर हुआ त्रिवेणी का संगम, श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों ने किया श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य का लोकार्पण

श्री महादेव की धरती पर हुआ त्रिवेणी का संगम, श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों ने किया श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य का लोकार्पण

Table of Contents

यहाँ क्लिक कर पोस्ट सुनें

श्रीमहादेव की धरती पर हुआ त्रिवेणी का संगम, श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों ने किया श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य का लोकार्पण

श्रीमहादेव ग्राम छाती में रामसिंह कुठ्ठी नेगी द्वारा विरचित ‘श्रीसुरेश्वरी महिमा’ महाकाव्य का लोकार्पण महोत्सव आयोजित

सूबे के विभिन्न जनपदों से आये साहित्यकारों, कवियों, मीडिया कर्मियों, लेखकों, रचनाकारों ने की शिरकत

मखलोगी प्रखण्ड अंतर्गत पहली बार आयोजित हुआ ऐसा ऐतिहासिक कार्यक्रम

टिहरी, 10 मई 2024ः श्रीमहादेव की धरती महादेव गांव छाती में आज अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों की त्रिवेणी का अनूठा संगम हुआ। प्रखण्ड के इस ऐतिहासिक अवसर पर श्रीसुरेश्वरी की इस त्रिवेणी ने महादेव गांववासी श्री रामसिंह कुठ्ठी नेगी द्वारा विरचित ‘श्रीसुरेश्वरी महिमा’’ महाकाव्य का लोकार्पण किया।

श्री महादेव की धरती पर हुआ त्रिवेणी का संगम, श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों ने किया श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य का लोकार्पण ‘अक्षय तृतीया’ महापर्व 28 प्रविष्टा सम्वत् 2081 शुक्रवार को पूर्वाह्न 10.00 बजे श्रीदेवदर्शनी भवन श्रीमहादेव ग्राम छाती में शिक्षक रामसिंह कुठ्ठी नेगी द्वारा विरचित ‘श्रीसुरेश्वरी महिमा’ महाकाव्य का लोकार्पण महोत्सव आयोजित किया गया। इस लोकार्पण महोत्सव में आयोजक रामसिंह कुठ्ठी नेगी द्वारा माता श्रीसुरकण्डा के मातुल, मैती व पुजारी जनों को प्रशस्ति व स्मृति चिन्ह समेत शॉल भेंटकर सम्मानित किया गया।

सैणी मखलोगी की भूमि पर इस प्रकार का ऐतिहासिक कार्यक्रम पहली बार आयोजित हुआ है, जो मखलोगी क्षेत्र की जनता को गौरवान्वित करता है। श्री रामसिंह कुठ्ठी नेगी द्वारा रचित श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक धरोहर है। जिसकी समारोह में आए अतिथिगणों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। वक्ताओं ने रचनाधर्मी रामसिंह कुठ्ठी अथक परिश्रम व विरचित महाकाव्य की सराहना करते हुए उनके माता-पिता व सहधर्मिणी कमला कुठ्ठी एवं अनुज गणेश कुठ्ठी नेगी का साधुवाद ज्ञापित किया।

श्री महादेव की धरती पर हुआ त्रिवेणी का संगम, श्रीसुरकण्डा के मामा मालकोटी, मैती जड़धारी, लेखवार पुजारियों ने किया श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य का लोकार्पणलोकार्पण समारोह की अध्यक्षता नैनीडांडा से आये वयोवृद्ध समाजसेवी जंगबहादुर सिंह नेगी द्वारा की गई। समारोह को मुख्य अतिथित्व स्वामी मुक्ता नंद जी ने किया, जबकि लोकार्पण समारोह का संचालन डा. हर्षा नन्द उनियाल ने किया।

 

‘श्रीसुरेश्वरी महिमा’ महाकाव्य का लोकार्पण महोत्सव इन्हें भेंट किए गए प्रशस्ति में जो कहा गया है, उसका विस्तारपूर्वक अध्ययन आप यहां कऱ सकते हैं।

श्रीसुरेश्वरी मातुल सम्मान

‘प्रशस्ति सतेली गांव’

सतेली गांव मालकोट पट्टी का प्रसि( गांव है। यह देहरादून जिले के डोईवाला विकास खण्ड का अंतिम गांव है। यह गांव गोरण डांडा की तलहटी में बांज, बुरांस, काफल, अखरोट, सेब, नाशपाती के वृक्षों से घिरा हुआ है। मालकोट पट्टी के सभी जन लोक परम्परा में माता श्रीसुरेश्वरी के मातुल (मामा) कहलाते हैं। विशेषकर मातुल का दर्जा सतेली गांव के तिवाड़ी ब्राह्मणों को प्राप्त है। लोक मान्यता के अनुसार गौंता गल़ा में एक लड़की ने सतेली गांव के वृद्ध व्यक्ति को मामा पुकारा था। वह लड़की साक्षात् श्रीसुरकण्डा देवी थी। तभी से तिवाड़ी विप्र श्रीसुरेश्वरी सुरकण्डा के प्रति भानजी का भाव रखते हैं। श्रीसुरकण्डा के जागरों में मामा मालकोटी कहा गया है। गोरण डांडा परियों का रमणीय स्थल है।

सतेली गांव के ब्राह्मण देवी सुरकण्डा को अपनी ईष्ट देवी मानकर उसकी पूजा अर्चना करते हैं। प्राचीन काल में सतेली के लोग त्रिवर्ष में देवी की कुटुम्ब जात्रा देने श्रीसुरकण्डा आते थे। हरियाली डालने से पूर्व देवी की जोत लेने श्रीसुरकण्डा आकर जलती जोत सतेली गांव ले जाते थे। सतेली गांव में श्रीसुरकण्डा देवी का छोटा मन्दिर है। जिसमें तिवाड़ी ब्राह्मण वर्षों से पूजा अर्चना करते आये हैं।

इस गांव में देवी श्रीसुरकण्डा के अनन्य भक्त हुए हैं। जिनमें ललिता प्रसाद तिवाड़ी, ब्रह्मानन्द सरस्वती, बृजमोहन तिवाड़ी इत्यादि हैं। पं. चन्द्रमोहन तिवाड़ी जी इस गांव के प्रसिद्ध शिक्षक और किसान थे। इन्होंने इस क्षेत्र में नाशपाती, सेब, अखरोट और नींबू के फलदार वृक्ष लगाकर इस क्षेत्र को समृद्ध बनाया था। इस गांव के स्व. रैठूराम तिवाड़ी और चिन्तामणी तिवाड़ी अपने जमाने के प्रसिद्ध समाजसेवी थे। सतेली गांव के विप्रजन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण हैं। इस गांव में संस्कृत भाषा के कई आचार्य शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत हैं। सतेली गांव के लोग शिक्षक के अलावा प्रसिद्ध भगवद् आचार्य भी हैं। वर्तमान में सतेली गांव पूनीवाला में बस गया है। पूनीवाला में श्रीसुरकण्डा देवी का ऊंची पहाड़ी पर प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर में दिन-रात भगवती श्रीसुरकण्डा की पूजा की जाती है।

पहाड़ की परम्पराओं को बचाने में सतेली गांव के ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण योगदान है। भगवती सुरकण्डा के प्रति इनकी अनन्य भक्ति भावना से प्रभावित होकर श्रीमहादेव गांव छाती श्रीसुरकण्डा मन्दिर समिति सतेली पूनीवाला को ‘श्रीसुरेश्वरी मातुल सम्मान’ से सम्मानित करती है।

श्रीसुरेश्वरी मैती सम्मान

‘प्रशस्ति जड़धारगांव’

जड़धार गांव सूरी सैण डांडा के नीचे पूर्वी पण्डाल पर एक पतली नाकधार के बीच में सम धरातल जमीन में बसा हुआ है। जब जड़धारगांव लगभग 22 तोक क्षेत्र में फैला हुआ है। यह बमुण्ड पट्टी में काफी बड़ा गांव है। जड़धारगांव चम्बा विकास खण्ड का सबसे बड़ा गांव होने के साथ ही कृषि प्रधान गांव है। इस गांव की जलवायु वन अर्थात् जंगल होने से ठण्डी है। नागणी गाड पर काफी सिंचित भूमि से इस गांव की हैसियत बहुत ही अच्छी है। यहां की भूमि शीतकालीन फसलों के लिए कम और बरसाती फसलों के लिए अच्छी है। यह पुस्तैनी मालगुजारों का गांव है। इनके पूर्वज 84 ज्यूलों से राजस्व एकत्र करते थे। जड़धारगांव में दो भड़ याने योध्या  पैदा हुए हैं। एक परमा भड़ तथा दूसरे शिवा भड़ थे। इस गांव के लोगों ने विश्य युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अपना बलिदान देकर क्षेत्र का नाम रोशन किया था। जन आंदोलनों में भी जड़धारगांव के नागरिकों की अहम् भूमिका रही है।

उत्तराखण्ड में प्राचीन काल से देवी-देवताओं के प्रति नाता-रिश्ता जोड़ने की परम्परा रही है। उत्तराखण्ड में जितने भी देवी-देवताओं के मन्दिर हैं। उस क्षेत्र के नजदीक बसे गांव ने देवी-देवताओं से सांसारिक नाते-रिश्ते जोड़े हैं। कोई देवी का अपनी बेटी के समान मानता है तो भानजी और तो कोई ईष्टदेवी के रूप में पुजारी बनकर उसकी पूजा करता है। इसी परम्परा के तहत जड़धारगांव के निवासी श्रीसुरेश्वरी देवी (सुरकण्डा) के मैती कहलाते हैं। याने लाडली बेटी के समान भाव रखकर पूजा करते हैं। जड़धारगांव श्रीसुरेश्वरी देवी (सुरकण्डा) का मैत गांव माना जाता है। इसी लोक मान्यता में जड़धारी लोग देवी सुरकण्डा के मैती कहलाते हैं।

ऐतिहासिक लोक मान्यता के अनुसार आदू जड़धारी देवी सुरकण्डा को अपनी पीठ पर बिठाकर लाने से मैती का लौकिक रिश्ता जुड़ गया। जड़धारी बन्धु कई वर्षों से श्रीसुरेश्वरी के प्रति मैती का भाव रखकर सेवा करते आये हैं। प्रत्येक तीन वर्ष के बाद माता सुरकण्डा को आदर सत्कार के साथ चौकीनुमा डोली अपने गांव लाकर माता की हरियाली डालकर पूजा करते हैं। तदोपरान्त गाजे-बाजों व ढोल दमांऊ के साथ बेटी की तरह विदा करते हैं। आज भी जड़धारगांव के निवासी सेवक के रूप में माता सुरकण्डा मन्दिर में अपनी प्रतिदिन हाजिरी देते हैं।

जड़धारगांव के लोगों ने माता सुरकण्डा के प्रति नागणी में देवीसेरा एक खेत भेंट में चढ़ा रखा था। जिसके चावल देवी सुरकण्डा की पूजा के लिए जाते थे। समय पड़ने पर मन्दिर के रख-रखाव का कार्य भी जड़धारगांव के लोग करते थे। जड़धारगांव के लोगों ने वर्षों से मैती परम्परा को जीवित रखा हुआ है। लौकिक जागरों के आधार पर जड़धारगांव के जड़धारी जन माता श्रीसुरेश्वरी के मैती कहलाते हैं। अर्थात् मायका (पीअर) वाले कहलाते हैं। इस बात की पुष्टि लौकिक गीतों से भी होती है।

जड़धारगांव वासियों की माता श्रीसुरकण्डा के प्रति भक्ति भावना और समर्पण से प्रभावित होकर श्रीमहादेव गांव छाती वासी श्रीसुरकण्डा मन्दिर समिति जड़धारगांव को ‘श्रीसुरेश्वरी मैती सम्मान’ से सम्मानित करती है।

श्रीसुरेश्वरी पुजारी सम्मान

‘प्रशस्ति पुजाल्डी गांव’

पुजाल्डी गांव अंधियारी गाड और हेवल नदी के पवित्र संगम से थोड़ा ऊपर की ओर बसा हुआ है। यह गांव बांज-बुरांस और चीड़ के सदाबहार जंगलों से घिरा हुआ है। यह एक अत्यन्त रमणीय गांव है। पुजाल्डी की चोपड़ियों की सारी इनको राज-दरवार से प्राप्त हुई थी। यह जमीन बहुत उपजाऊ थी। इस गांव में श्रीसुरेश्वरी देवी के वेदपाठी, कर्मकाण्डी, लेखवार जाति के विप्र निवास करते हैं।

पुजाल्डी गांव भगवती श्रीसुरेश्वरी का प्राचीन मठ गांव माना जाता है। जब प्राचीन काल में सुरकूट पर्वत पर अत्यधिक वर्फ गिर जाती थी तब छः माह भगवती श्रीसुरेश्वरी की पूजा मठ गांव पुजाल्डी में होती थी। पुजाल्डी ब्राह्मणों की देवी सुरकण्डा के प्रति अपार श्रद्धा भक्ति है।

सुरकूट पर्वत पर वर्फ गिरने के बाद भी इनके डांडा में दिवा देने की धार है वहां पर यह लोग माता सुरकण्डा का दीपक जलाते थे। इस जगह की यह विशेषता है कि यहां से माता श्रीसुरेश्वरी मन्दिर के साक्षात् दर्शन होते हैं। पुजाल्डी ब्राह्मणों को औतणी ब्राह्मण भी कहते हैं। इनका मूल गांव औतण है। इनके पूर्वज अत्रि गोत्री ब्राह्मण हैं। जो कन्नौज से तीर्थ यात्रा के दौरान औतण गांव में बस गए थे। औतण ब्राह्मणों के पूर्वज त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने पुरुषोड़ा जमींदार को अपनी भविष्यवाणी से प्रभावित कर औतण गांव में गुरुपद प्राप्त कर सम्मान हासिल किया था।

पुजाल्डी स्थित श्रीसुरेश्वरी मन्दिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सुरकूट पर्वतकी जड़धार में बसा हुआ है। राजा ने इनको बेगार प्रथा से मुक्त रखा हुआ था। पुजाल्डी के ब्राह्मण बारी-बारी से माता सुरकण्डा की पूजा अर्चना करते हैं। इस गांव के संस्कृत के अनेक विद्वान देश-विदेश में पठन-पाठन का कार्य करवाते हैं। अत्रि गोत्र पर मां श्रीसुरेश्वरी की अपार कृपा है।

इस क्षेत्र में ब्राह्मणों के अनेक गांव हैं, परन्तु माता सुरकण्डा इनके भोलेपन एवं समर्पण भाव से प्रभावित होकर इनकी पूजा से ही संतुष्ट होती है। इस गांव के श्री रामेश्वर पुजारी अपने जमाने के ख्याति प्राप्त पण्डित थे। इस गांव में स्व. गजेन्द्र दत्त, नत्थी लाल, सुरेन्द्र, रामेश्वर देवी सुरकण्डा के प्रसिद्ध अनन्य भक्त थे।

पुजाल्डी गांव वासियों की माता श्रीसुरकण्डा के प्रति भक्ति भावना और समर्पण से प्रभावित होकर श्रीमहादेव गांव छाती वासी श्रीसुरकण्डा मन्दिर समिति पुजाल्डी गांव को ‘श्रीसुरेश्वरी पुजारी सम्मान’ से सम्मानित करती है।

समारोह में मैती पक्ष से जड़धारगांव से बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी, वरिष्ठ पत्रकार रघुभाई जड़धारी, विनोद जड़धारी, सुखपाल जड़धारी, मातुल याने मामा पक्ष से व्यास श्री विजेन्द्र तिवाड़ी, व्यास श्री हेमा नन्द तिवाड़ी, श्री जगदीश ग्रामीण पुजारी पक्ष से श्रीसुरकण्डा माता के पुजारी श्री रमेश लेखवार लोकार्पण अतिथि रहे।

इसके अलावा खण्डकरी इंटर कालेज प्रधानाचार्य डा. अम्बरीश चमोली, अध्यापक जगदीश ग्रामीण, नगर पालिका चम्बा के सभासद शक्ति जोशी, समाजसेवी मोर सिंह धनोला, अध्यापक भगवान सिंह  कुठ्ठी, अजीत कुठ्ठी, पुरुषोत्तम उनियाल, लम्बगांव महाविद्यालय के डा. भरत सिंह राणा, हेवलवाणी के रवि गुसांई, विनोद रावत, गोपाल सिंह मखलोगा, दिवाड़ा के पूर्व प्रधान मकान सिंह, सनराईज पब्लिक स्कूल के प्रधानाचार्य श्री आरएस मखलोगा, क्षेत्रीय जन प्रतिनिधि एवं महादेव गांववासी वरिष्ठ नागरिक, मातृशक्ति, युवाशक्ति, कवि साहित्यकार, लेखक, मीडिया कर्मी इस लोकार्पण समारोह के साक्षी बने।

डा. अम्बरीश चमोली ने समारोह स्थल पर ही श्री महादेव एवं श्रीसुरेश्वरी महिमा महाकाव्य पर एक कविता रचकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया, जबकि रवि गुसांई एवं नैनीडांडा के समाजसेवी जंगबहादुर नेगी ने माता भगवती एवं कुमाउनी गीत गाकर समारोह में चार चांद लगाए।

कार्यक्रम के अंत में रचनाधर्मी रामसिंह कुठ्ठी नेगी व उनकी सहधर्मिणी कमला कुठ्ठी ने सभी अतिथिजनों एवं उपस्थित जन समूह का आभार प्रकट किया। तदोपरान्त प्रसाद रूप में रसोईया के दाल-भात के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया। ढोल वादक चेतन दास, मंगल दास, भगवान दास एवं मशकबीन वादक मोहन मोनीदास ने ढोल दमाऊ की थाप व मशकबीन से समारोह की शोभा बढाई।

*केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’

Comment