श्रीमद्भागवत महापुराण कथा मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि ज्ञान भक्ति और वैराग्य की धारा है : आचार्य दिनेश उनियाल

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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि ज्ञान भक्ति और वैराग्य की धारा है : आचार्य दिनेश उनियाल

जौनपुर प्रखंड के हवेली (सकलाना) में दिव्य श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ का आयोजन

टिहरी, सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’: जौनपुर प्रखंड के हवेली (सकलाना) में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ गतिमान है। श्री ऋषि राम सकलानी द्वारा अपनी धर्मपत्नी स्वर्गीय पुष्पा देवी सकलानी के एकोदिष्ठ वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर यह ज्ञान यज्ञ आयोजित किया जा रहा है। प्रकांड विद्वान दिनेश उनियाल व्यास पीठ से भागवत की धार्मिक रोचक और ज्ञानगम्य कथाएं श्रोताओं के सम्मुख साझा कर रहे हैं। शास्त्र के मुताबिक मूल पाठ के बाद 2:00 बजे से 5:30 बजे तक नियमित कथा श्रोता, श्रवण कर रहें हैं। सकलाना के अलावा दूरदराज से श्रोता भागवत की कथा सुनने के लिए समय से अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण कथा मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि ज्ञान भक्ति और वैराग्य की धारा है : आचार्य दिनेश उनियाल विद्वान आचार्य ने कहा कि ईश्वर शिव का एक नाम है, किसी अन्य देवता का नहीं। यहां तक की ब्रह्मा, विष्णु या हमारे अन्य देवों का भी ईश्वर नाम शास्त्र में नहीं है। धार्मिक कथाओं के अलावा विद्वान आचार्य ने अनेकों समाज उपयोगी बातें लोगों के सम्मुख साझा की। कहा भागवत पूर्ण रूप से ज्ञान भक्ति और वैराग्य की तीन धाराओं में प्रवाहित होती है। भजन कीर्तन का भी श्रोता खूब आनंद ले रहे हैं। व्यास जी ने कहा कि ब्राह्मण को समदर्शी होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए, यही सर्वोत्तम गुण है। मृत्यु से पूर्व अपने सभी संकल्पों की पूर्ति कर देनी चाहिए।

शास्त्रीय विधान के अनुसार विवाह पर चर्चा करते हुए आचार्य ने कहा कि शिव और सती के विवाह अनुकरणीय उदाहरण है। विवाह केवल एक बंधन नहीं है बल्कि विश्वास शक्ति और प्रेरणा का प्रतीक है। विवाह में जो सात फेरे होते हैं चार फेरे ही मुख्य हैं बाकी तीन फेरे अग्नि परिक्रमा होती है। कहा कि अपने इष्ट देवता पर प्रत्येक को अटूट विश्वास होना चाहिए तथा महान व्यक्ति वही है जो धैर्य से कार्य करे।

मानवीय दोषों का भी अपने उल्लेख किया। निर्गुणी, मूर्ख, कार्पण्य दोष और आत्म दोष की विस्तृत व्याख्या की गई। बताया कि सुखदेव जी श्रेष्ठतम वक्ता और परीक्षित श्रेष्ठतम श्रोता माने गए हैं। तीन धाराओं में भागवत की कथा चलती है भक्ति, ज्ञान और वैराग्य। आरंभ के दिन हुई कलश यात्रा के बारे में आपने बताया कि भागवत में कलश यात्रा का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। सत् चंडी यात्रा का भाग है। कलश यात्रा तो जल यात्रा है। सात दिनों तक जल यात्रा के कलशों के जल का उपयोग पूजा में किया जाता है। बाकी बचे हुए जल को यजमान अमृत स्थान के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

भागवत की कथा भावनाओं और संस्कारों की क्रांति लाती है। जब महर्षि वाल्मीकि से प्रश्न पूछा गया की सीता का हरण क्यों हुआ? तो आचार्य ने सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए श्लोक की व्याख्या की। “अति रूपेेण वै सीता अति गर्वेण रावण:। अति दानाद् बलिर्वद्धो: अति सर्वत्र वर्जियेत।” जीवन और प्राण वायु के सिद्धांत की भी विवेचना की गई। भागवत महापुराण कथा आयोजन श्री ऋषि राम सकलानी उनके पुत्र कृष्णकांत और कमलेश सकलानी कर रहें हैं। समस्त ग्रामवासी तथा सकलानी बंधु- बांधव अपेक्षित सहयोग कर रहे हैं।

इस अवसर पर आज विधायक प्रीतम पंवार, अनुसूया प्रसाद उनियाल, ऋषि सेमवाल, विजय सकलानी, सुषमा सकलानी, राकेश उनियाल आदि उपस्थित हुए।

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