श्रीदेव सुमन जी के संदूक के बहाने जयन्ती पर किया स्मरण

0
133
यहाँ क्लिक कर पोस्ट सुनें

श्रीदेव सुमन जी के संदूक के बहाने जयन्ती पर किया स्मरण

स्व. रमेश दत्त सकलानी (सुमन जी के साले) के उपकार को भी किया याद, विनय लक्ष्मी सुमन के उत्सर्ग को किया नमन

स्व. सुंदरलाल बहुगुणा के साथ आराकोट-अस्कोट यात्रा पर की चर्चा

सुमन जयंती (25 मई 2024) के अवसर पर प्रतिष्ठित जमना लाल बाजार पुरस्कार से सम्मानित, समाजसेवी और पर्यावरणविद आदरणीय गुरुजी श्री धूम सिंह जी का फोन आया। 84 वर्षीय श्री धूम सिंह नेगी वृद्धावस्था और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण भले ही वे श्रीदेव सुमन जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने या स्मरण करने उनके पैतृक गांव जौल नहीं आ पाए लेकिन उन्होंने दूरभाष के द्वारा सुमन जी को नमन करते हुए अनेक संस्मरण बंया किये।

कहा कि एक बार जब वे बांध विरोधी आंदोलन में स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा जी के साथ पुरानी टिहरी में थे तो अचानक ही अस्वस्थ हो गए। सुंदरलाल बहुगुणा जी का रमेश दत्त सकलानी जी के साथ निकट का संबंध था और उन्होंने उन्हे (नेगी जी को) स्वास्थ्य लाभ के लिए कुछ दिन उनके घर पर विश्राम करने की सलाह दी। श्री धूम सिंह नेगी जी बहुगुणा जी की सलाह मानी और रमेश दत्त सकलानी जी के यहां चले गये। काफी लंबे समय तक उन्होंने वहां पर स्वास्थ्य लाभ किया और पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गए।

उस गुजरे वक्त को याद करते हुए श्री धूम सिंह नेगी बताते हैं कि पूर्व प्रधानाचार्य रमेश दत्त सकलानी जी के घर पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे तो उन्हें एक प्रतिभूति के दर्शन हुए और वह था “श्रीदेव सुमन जी का संदूक”। भले ही उस संदूक का ताला खुलवाकर उसमें रखी हुई मूल्यवान वस्तुओं जैसे सुमन सौरभ, सुमन जी के पत्र, सुमन जी के रोजमर्रा के जीवन का सामान, सुमन जी के कविताएं, आलेख तथा आंदोलन संबंधी महत्वपूर्ण कागजात आदि उन्हें देखने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनके मन में हमेशा यह उत्कंठा रही कि सुमन जी के उस संदूक पर न जाने कितनी बहुमूल्य और बेशकीमती चीजे संग्रहित होंगी जो की सुरक्षित उनके ससुराल के एक कमरे में विद्यमान थी।

अस्वस्थता और लोक शिष्टाचार के कारण भले ही वह रमेश सकलानी जी से उस संंदूक को खुलवाने का आग्रह नहीं किया, लेकिन हमेशा ही यह बात उनके मन में सागर की लहरों की तरह थपेड़े मारती रहती है कि न जाने उस संदूक में क्या-क्या रहा होगा? कितना समाज उपयोगी, महत्वपूर्ण सामान आने वाली पीढ़ी के लिए एक धरोहर के रूप में संग्रहित है।

श्री धूम सिंह नेगी जी ने बताया कि लंबे समय तक स्व. सुंदरलाल बहुगुणा जी के साथ उन्होंने मिलकर के काम किया। अनेक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और बहुत कुछ स्व. बहुगुणा जी से सीखने को भी मिला।

श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी के साथ आराकोट से अस्कोट तक की पदयात्रा में भी वे शामिल हुए जो लोक जीवन, लोक संस्कृति, लोक समाज और हिमालय पारिस्थितिकी को समझने में मददगार सिद्ध हुई। आज के युग में इस प्रकार की पदयात्राएं करना नामुमकिन है। यह केवल अब इतिहास की बात हो चुकी हैं।

श्री रमेश दत्त सकलानी जी की बहन विनय लक्ष्मी सकलानी सुमन, क्रांति के अग्रदूत बलिदानी श्रीदेव सुमन जी की पत्नी थी। स्व. विनय लक्ष्मी सुमन का भी टिहरी के लिए बलिदान में अग्रिम स्थान रहा। छोटी उम्र में उनका विवाह हो चुका था और उन्होंने कभी भी अपने वैवाहिक जीवन का दैहिक सुख प्राप्त नहीं किया। विवाह के तुरंत पश्चात सुमन जी गिरफ्तार कर लिए गए थे।

पुरानी टिहरी की काल कोठरी में 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद उनका सर्वोच्च बलिदान हुआ और दुष्ट करिंदों ने बोरी में भर के उनके पार्थिव शरीर को भिलंगना में कहीं डुबो दिया। उनके परिवार, पत्नी को सुमन जी के अंतिम दर्शन भी नहीं हो सके। बाद के वर्षों में श्रीमती विनय लक्ष्मी ने सुमन जी के नाम पर ही पूरे जीवन को एक सामाजिक दायित्व समझते हुए निर्वहन किया जो कि एक मिसाल है। मातृशक्ति के लिए एक संदेश है।

सुमन जयंती के अवसर पर अनेक बातें बीच बचाओ आंदोलन के अगुवों में से एक तथा मशहूर पर्यावरण श्री धूम सिंह नेगी जी के साथ हुई। अपने अध्यापन काल के समय के अनेक संस्मरण उन्होंने सुनाये। सरकारी नौकरी को त्याग करके जाजल स्कूल के प्रधानाध्यापक का पदभार ग्रहण करना, 13 साल तक वहां पर हेड मास्टर के रूप में कार्य करना, अनेक प्रकार के भौतिक और शैक्षिक कार्य विद्यालय के लिए करना तथा पर्यावरण संरक्षण आदि में सहयोग मे श्री नेगी की भूमिका आदि के बारे में चर्चा हुई।

बताया कि सुमन जी के अनुयायियों में स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा जी एक थे और उन्हीं के मार्गदर्शन पर उन्होंने समाज सेवा का व्रत लिया। जिसका वह आजीवन निष्ठा पूर्वक निर्वहन करते रहे। उनका सौभाग्य था कि स्वर्गीय बहुगुणा जी के साथ उन्हें लंबे समय तक कार्य करने का अवसर मिला।

श्री रमेश दत्त सकलानी जी के बारे में आपने विस्तार से उनके घर पर बिताए गए पलों का स्मरण किया। अत्यंत आदर पूर्वक उन्होंने अपनी अस्वस्थता के समय सकलानी परिवार के सहयोग को भी बयां किया। बातचीत में आदरणीय नेगी जी ने बताया कि रमेश दत्त सकलानी जी अपने पैतृक गांव की जल समाधि के दर्द को चुपचाप सीने में छुपाये रहे। उन्हें अपनी एक संस्कृति का मिट जाने का दुख था। वृद्धावस्था में वे देहरादून में अपने बंजारावाला स्थित घर में जीवन निर्वहन करने लगे और वहीं पर उनका स्वर्गवास हुआ।

35 वर्षों तक रमेश सकलानी ने मन वचन और कर्म से, सत्य निष्ठा और ईमानदारी से, शिक्षण कार्य किया और बाद में इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्ति हुई। आज उनके पढ़ाये छात्र विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद आपको ग्राम सभा के प्रधान के रूप में सम्मान मिला। आपकी लोकप्रियता अंतिम पल तक रही। अंग्रेजी व्याकरण पर आपका एकाधिकार था। सन 1950 में रमेश दत्त सकलानी ने अंग्रेजी व्याकरण की एक पुस्तक प्रकाशित की थी जो कि माध्यमिक कक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी रही। उनका एक पुत्र सेना में कर्नल और दूसरा उत्तर प्रदेश से वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत हुए हैं।

श्री धूम सिंह नेगी ने सुमन जयंती के अवसर पर अमर शहीद श्रीदेव सुमन जी, महान समाजसेवी रमेश दत्त सकलानी जी (सुमन जी के बहनोई) को सुुमन जी के संदूक के बहाने याद किया। श्री धूम सिंह नेगी जी और उनकी सेवाओं को प्रणाम और ईश्वर से प्रार्थना  कि श्री नेगी जी अपने उत्कृष्ट ज्ञान के द्वारा समाज को लाभान्वित करते रहें।

*सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

(कवि कुटीर)
सुमन कॉलोनी चंबा टेहरी गढ़वाल

Comment