विश्व वानिकी दिवस पर विशेष: प्रधान, लिखवार गांव, प्रतापनगर, चन्द्रशेखर पैन्यूली के उदगार

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विश्व वानिकी दिवस पर विशेष प्रधान, लिखवार गांव, प्रतापनगर, चन्द्रशेखर पैन्यूली के उदगार
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विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

जब पूरी दुनिया में दिन और रात बराबर समय का होता है ऐसा दिन विश्व वानिकी दिवस के रूप में मनाते हैं

विश्व वानिकी दिवस है, यानि आज के दिन हम अपने वनों, पेड़ पौधों, वन सम्पदा को लेकर बात चीत करते हैं, आने वाली तमाम समस्याओं के प्रति सचेत रहने की बात करते हैं और वनों से या पेड़ों से होने वाले तमाम लाभों को गिनाते हैं। आज 21 मार्च के दिन जबकि पूरी दुनिया में दिन और रात आज बराबर समय का होता है ऐसा दिन हम विश्व वानिकी दिवस के रूप में मनाते हैं, मतलब साफ कि यदि दिन रात बराबर है अर्थात संतुलित है तो हमें अपने पर्यावरण को संतुलित बनाए रखना चाहिए।

विश्व वानिकी दिवस मनाने का विचार 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23वीं महासभा में आया। वानिकी के तीन महत्वपूर्ण तत्वों- सुरक्षा, उत्पादन और वनविहार के बारे में लोगों को जानकारियां देने के लिए उसी साल बाद में 21 मार्च के दिन को यानि दक्षिणी गोलार्ध में शरद विषव और उत्तरी गोलार्ध में वसंत विषव के दिन को चुना गया। वन प्रागैतिहासिक काल से ही मानवजाति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है।

वन का मतलब केवल पेड़ नहीं है बल्कि यह एक संपूर्ण जटिल जीवंत समुदाय है। वन की छतरी के नीचे कई सारे पेड़ और जीव-जंतु रहते हैं। वनभूमि जीवाणु, कवक जैसे कई प्रकार के जीवों के घर हैं। ये जीव भूमि और वन में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आज वनों व वन सम्पदा से जुड़े तमाम विषयों,तमाम चुनौतियों पर सवाल जवाब आदि उठते हैं।हमारे भारत में तकरीबन 22 फीसदी से अधिक भूभाग पर वन क्षेत्र हैं,हमारे देश में वन महोत्सव आदि कार्यक्रम भी इसी उद्देश्य से मनाए जाते हैं कि हमारे चारों तरफ हरियाली हो, हमारा पर्यावरण संतुलन बना रहे व प्रकृति सुरक्षित रहे।

लेकिन दुःख की बात कि जितनी ज्यादा बातें वनों या वन्य सम्पदा को बचाने को लेकर होती है असल में धरातल पर होता बहुत कम है। यदि अपने प्रदेश उत्तराखंड की बात करूं तो पर्वतीय जिलों में तो अधिकाशं हिस्सा वन क्षेत्र ही है, बल्कि सैकड़ों गांव वनों के बीच में ही है। मै अधिकांश सुनता हूं जब वनों को बचाने की बात उठती हैं,जल स्त्रोतों को बचाने की बात उठती है तो हमें दिल्ली देहरादून, हलद्वानी, कोटद्वार, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुड़की, रुद्रपुर आदि जगहों से ज्ञान दिया जाता है कि पर्यावरण बचाओ, अरे मेरे महानुभावों तुम स्वयं बड़े बड़े होटलों,ऑफिसो के एसी कमरों से हमे ज्ञान तो मत ही दो, तुम हम पहाड़ियों को इस मसले पर ज्ञान ही न दें तो अच्छा ही है,तुमने तो अपनी कृषि भूमि करोड़ों में बेच दी और उस पर कंक्रीट के जंगल उगा लिए और अब पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ हमारी है क्या?

तुम कह रहे हो भूजल काफी नीचे चला गया,वो जाएगा नहीं क्या?तुम जमीन बेचो उस पर हजारों लोग बस गए,हर किसी ने अपना हैंडपंप,अपना नल,अपना नलकूप अपनी बोरिंग कर दी तो वो पानी घटेगा ही,तुमने आस पास की हरियाली खत्म कर दी,तमाम पेड़ रातो रात काटकर जमीनों को बेचा और अब ज्ञान दे रहे कि पर्यावरण बचाओ।पर्यावरण बचाने का ठेका क्या सिर्फ पहाड़ियों ने उठा रखा है,जो जंगली जानवरो की मार भी झेल रहे हैं, जो बेमौसमी वर्षा,ओलों आदि से परेशान है तब भी पहाड़ों की रौनक बनाए हुए हैं, जो जंगली सुवरों, बंदरों द्वारा बोई गई फसलों को चपट करने के बाद भी अपने पुरखो की जमीनों को आबाद किए हुए हैं, तुम उन्हें ज्ञान तो मत ही दो कि वनों को बचाओ। बल्कि अपने गिरेबान में झांक कर देखें कि आपने क्या योगदान दिया इन जंगलों को बचाने के लिए, क्या वनों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ वन विभाग की ही है, जल जंगल व जमीन सभी को पालते हैं और दुःख की बात है कि आज यही संकट में है।

क्या वनों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ गौरा देवी जी की थी, क्या सिर्फ सुंदरलाल बहुगुणा की जिम्मेदारी पर्यावरण बचाने की थी, क्या चंडी प्रसाद भट्ट या कल्याण सिंह रावत की जिम्मेदारी इस प्रकृति या पहाड़ों की हरियाली की जिम्मेदारी की है, क्या जगत सिंह चौधरी जंगली या त्रिलोक सोनी की जिम्मेदारी है पेड़ों को लगाने की,ऐसे कुछ और नाम जो हर ब्लॉक या जिलों में होंगे जो पर्यावरण या जल जंगल जमीन को लेकर चिंतित रहते हैं और वो खूब पेड़ लगाते हैं लेकिन कुछ तथाकथित बड़े लोग बड़े बड़े होटलों में बैठकर बन्द बोतल पानी पीकर एसी के नीचे बैठकर कमरों में मनी प्लांट के गमले लगाकर ज्ञान देंगे वनों को बचाने का तो ऐसे महानुभावों से आग्रह है कि आप भी जमीनी हकीकत समझे और जमीन पर काम कीजिए, क्योंंकि यदि वन बचेंगे तो हमारे जल स्त्रोत्र बचेंगे और हमारा पर्यावरण का संतुलन भी बना रहेगा,

मैं अपने लिखवार गांव की बात करूं तो हमारे गांव क्षेत्रफल का बहुत बड़ा भूभाग वन क्षेत्र है, हम प्रत्येक वर्ष वनों की सुरक्षा के लिए 50 हजार रूपए गांव के वन रक्षक को देते हैं, वो इसलिए कि हमारा वन क्षेत्र सुरक्षित रहे,हरा भरा रहे, साथ ही हमे पेयजल की निर्वाध आपूर्ति होती रहे, हमारे पशुओं को चारा पत्ती मिलती रहे, हमारे खेत उपजाऊ रहे।

एसी कमरों में बैठकर जंगल नहीं बचा करते बल्कि जंगलों को बचाने के लिए जमीन पर कार्य करना होता है, पेड़ लगाने के साथ साथ उनकी देख भाल करनी होती है, जंगल सिर्फ वन विभाग की ही संपति नहीं है बल्कि हम सभी की संपति है, कई लोग जंगलों में जबरन आग लगाते हैं, कई लोग वन विहार करते हुए वनों में तमाम कचरा डालते हैं, तो क्या इन जंगलों की जिम्मेदारी सिर्फ जंगलात की है?

जब तक हमारे मन में जंगलों के महत्व की बात न होगी तब तक हम सिर्फ वनों को जंगलात वालों का ही समझेंगे, लेकिन जब हम गहराई से सोचेंगे तो समझ में आएगा कि ये जंगल ये नदी ये गदेरे ये जल स्त्रोत्र सिर्फ कुछेक गांव या क्षेत्र के नहीं बल्कि सभी के है क्योंंकि इनसे हम सभी को हवा मिलती है, पानी मिलता है, मै तो यही कहूंगा कि जो गांव वनों को संरक्षित करने के लिए वर्षों से पीढ़ियों से कार्य कर रहे हैं उन गांवो के लोगो को सम्मानित किया जाना चाहिए।

मेरे शब्दों से मेरे कुछ मित्रों, मेरे कुछ महानुभाव यदि नाराज हुए होंगे तो मै क्षमा चाहता हूं लेकिन हकीकत यही है कि वनों को बचाने की मुहिम जब तक ईमानदारी से धरातल पर न हो तो फिर इसके निमित होने वाले कार्यक्रमों की कोई सार्थकता नहीं हो सकती हैं, सिर्फ विश्व वन दिवस की बधाई देने से वन नहीं बच सकते हैं, बल्कि सभी लोगो की इच्छाशक्ति से वन व पर्यावरण सुरक्षित रह सकते हैं।

चन्द्रशेखर पैन्यूली
प्रधान, लिखवार गांव
प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल।

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