विश्वकर्मा दिवस विशेष: हिंदू धर्म, संस्कृति और साहित्य में प्रकृति के प्रत्येक अवयव का महत्व है

विश्वकर्मा दिवस विशेष: हिंदू धर्म, संस्कृति और साहित्य में प्रकृति के प्रत्येक अवयव का महत्व है
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विश्वकर्मा दिवस: हिंदू धर्म, संस्कृति और साहित्य में प्रकृति के प्रत्येक अवयव का महत्व है। जड़-चेतन के अद्भुत संयोग का विश्व के इतिहास में अन्यत्र ऐसा विवरण नहीं मिलता है। तैंतीस करोड़ देवी- देवता, अट्ठासी हजार ऋषि मुनि और एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (सुर तैंतसों कोटिक आए, मुनि जन सहस अठासी। कहे कबीर हम व्याह चले हैं, पुरुष एक अविनाशी: कबीर) की अवधारणा हमारी वैदिक संस्कृति में है। 

सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

जितनी सुंदर परिकल्पना सनातन साहित्य में निहित है उतनी अन्यत्र नहीं। सृष्टि के कर्ता, पालनहार और अंत करने वाले, ब्रह्मा- विष्णु- महेश तथा महायोगिनी महामाया मां भगवती का स्वरूप हो या प्रकृति और पुरुष का नाता या अर्धनारीश्वर शिव की परिकल्पना प्रत्येक का अपना महत्व है। आज भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती है। ब्रह्मा जी के द्वारा जब सृष्टि का निर्माण किया गया तो धार्मिक ग्रंथों में ऐसा माना जाता है कि वह अंडाकार पृथ्वी उन्होंने शेषनाग की जीभ के ऊपर स्थापित कर दी थी। जिसके कंपन के फलस्वरूप नुकसान होने लग गया था। इसलिए ब्रह्मा जी ने अपने वंशज भगवान विश्वकर्मा को पृथ्वी को स्थिर करने का आदेश दिया भगवान विश्वकर्मा ने मेरु पर्वत को जल में र करके पृथ्वी को स्थिर कर दिया और सृष्टि के प्रथम वास्तुकार या इंजीनियर होने का गौरव हासिल किया।

हर वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को भगवान विश्वकर्मा की जयंती मनाई जाती है। कोरोना महामारी के कारण उस उल्लास के साथ इस बार तो जयंती बमुश्किल मनाई जाएगी लेकिन फिर भी अपने इस महान देवता की पूजा तो हम कर ही सकते हैं। मैं चंबा के ऐसे क्षेत्र में निवास करता हूं जहां की अधिकांश जनसंख्या मजदूर, मिस्त्री, पेंटर ,कारपेंटर, प्लंबर, फिटर आदि लोगों का निवास भी है। बड़े हर्षोल्लास के साथ मजदूर वर्ग इस त्यौहार को मनाता है और समय-समय पर मौसमी फल, मिष्ठान, पंचमेवा और पंचामृत आदि मुझे भी प्रदान करते आए हैं।

आज के दिन वे अपने औजारों की पूजा करते हैं और पूर्ण अवकाश रखते हैं। एक अद्भुत उत्साह मजदूर वर्ग के अंदर इस दिन देखने को मिलता है । यद्यपि भगवान विश्वकर्मा के कार्यों के बारे में वह अनभिज्ञ हैं लेकिन असीम श्रद्धा का भाव उनके मन में निहित है। इस त्योहार के दिन मैंने किसी मजदूर वर्ग को नशा पान का सेवन करते हुए आज तक नहीं देखा है। भगवान विश्वकर्मा सर्जन और निर्माण के देवता माने जाते हैं और जैसे कि धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है भगवान कृष्ण की द्वारिका पुरी, देवताओं का पुष्पक विमान, इंद्र का वज्र, शिवजी का त्रिशूल और इंद्रप्रस्थ नगर का निर्माण उन्हीं के हाथों के द्वारा हुआ था। वह सुख समृद्धि के देवता हैं।

मैं विश्वकर्मा दिवस के अवसर पर समस्त वास्तु विदो, इंजीनियरों, देश के मजदूर वर्ग और जितने भी निर्माण और सर्जन करता है उनका नमन करता हूं ।

* हाल निवास सुमन कॉलोनी चंबा , टिहरी गढ़वाल।