विश्वकर्मा जयंती पर हम भी एक संकल्प ले सकते हैं कि इस मानव तन से परमार्थ का कर्म करें

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आज वामन अवतार, विश्वकर्मा जयंती पर हम भी एक संकल्प ले सकते हैं कि इस मानव तन से परमार्थ का कर्म करें।

सरहद का साक्षी @ ज्योतिषाचार्य हर्षमणि बहुगुणा


विश्वकर्मा जयंती पर हम यह चिन्तन करते हुए आगे बढ़ें कि संसार से मिली हुई सामग्री को अपनी मानकर सेवा में लगाने से अभिमान आता है। अतः सेवा के लिए सामग्री की नहीं, हृदय की आवश्यकता है। कसौटी कस कर देखा जाय तो पता चलता है कि सेवा का तो बहाना है। सम्भवतः अच्छाई के चोले में बुराई भी रहती है। ‘कालनेमि जिमि रावन राहू।’ उपर अच्छाई का चोला व भीतर बुराई भरी हो। यही बुराई सबसे भयंकर होती है, जो बुराई प्रत्यक्ष होती है वह इतनी खतरनाक नहीं होती, जितनी यह। दूसरे के दु:ख से दु:खी व सुख से सुखी होकर ही सेवा की जा सकती है।

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यह बात अति आवश्यक व महत्वपूर्ण भी है कि दूसरों के दु:ख से दुखी होने वाला अपने दु:ख से कभी दुखी नहीं होता और दूसरों के सुख से सुखी होने वाला अपने सुख के लिए कभी भी संग्रह नहीं करता।

अतः महिमा के लिए नहीं आत्म शान्ति के लिए समाज की सेवा करने की आवश्यकता है। तो आइए! इस आश्विन मास में जिसमें आज श्रवण द्वादशी है व आज विष्णु श्रृंखल योग है के सूर्योदय से परदु:ख से द्रवित होकर परमार्थ करने का फैसला लिया जाय। यही पुण्य है, ऐसा करने से हमारी-आपकी मानवता नित दूनी बढ़ेगी।