मोरी की घटना इंसानियत के माथे पर एक और दाग! समाज विरोधी तत्वों को मिले कठोर सजा

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    मोरी की घटना इंसानियत के माथे पर एक और दाग है।

    समाज विरोधी तत्वों को कठोर सजा मिलनी चाहिए।समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ कि मोरी प्रखंड के सालारा गांव के मंदिर में अनुसूचित जाति के एक नौजवान आयुष के प्रवेश करने पर कुछ समाज विरोधी और अराजक तत्वों के द्वारा ज्यादती की गई। मंदिर प्रवेश पर उन्हें जलती लकड़ी से दागा गया, जिसकी फोटो भी प्रिंट और सोशल मीडिया में सभी लोग देख रहे होंगे। इस घिनौनी करतूत के लिए अपराधियों को कानून तो अपने हिसाब से सख्त से सख्त सजा देगा ही लेकिन समाज के लोगों को इस प्रकार के कबीलाई संस्कृति पर विश्वास रखने वाले लोगों का बहिष्कार करना चाहिए।

    कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

    धर्म और राजनीति मनुष्य के कल्याण के लिए सनातन प्रचलित व्यवस्थाएं हैं लेकिन जब धर्म के मार्ग पर अधर्म और राजनीति के स्थान पर अराजकता शुरू होती है तो वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए एक बुरे स्वप्न के समान है। मानवता से घृणा करने वाला इंसान व्यक्ति नहीं हैवान है और इस तरह की हैवानियत हमारी सामाजिक समरसता को तोड़ने का प्रयास भी करती है। दकियानूसी सोच, पाखंड और अंधविश्वास का साम्राज्य यदि वर्तमान समय में भी समाज और धार्मिक स्थलों पर हाजिर रहेगा तो हम किस समाज की परिकल्पना कर सकते हैं ?

    मीडिया की भूमिका को लोग कोसते हैं किन्तु यदि मीडिया भी न होता तो इस प्रकार के अपराधी, नरभक्षी लोग इंसानों को जिंदा ही खा जाते। शहरों और मैदानी क्षेत्रों में अक्सर इस प्रकार के घिनौने कृत्य सुनने में आते रहते थे, लेकिन उत्तराखंड के पावन भूमि में शायद ही इस प्रकार की घिनौनी करतूत की जाती रही हो लेकिन दुष्टों का हौसला दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और वह अपनी काली करतूतों से बाज नहीं आ रहे हैं। एक ओर हम सभ्य होने का स्वांग रचते हैं और दूसरी ओर इस प्रकार के समाज विरोधी कार्य करते हैं जोकि निंदनीय है।
    सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। यदि उत्तराखंड में भी इस प्रकार की हत्या, हिंसा,व्यभिचार, छुआछूत का साम्राज्य बढ़ता गया तो आने वाले समय में यह पाषाण युग को भी मात दे देगा।

    मानवता के माथे पर ऐसा कृत्य कलंक है। समाज आज भी दकियानूसी सोच से जकड़ा है। ऐसे कृत्य करने वालों को सम्बंधित गांव और समाज दण्ड दे। सामाजिक समरसता बिगाड़ने वाले दुष्टों को ईश्वर भी माफ न करे।यहां भावनाओं का प्रश्न नही है,विचारणीय बिषय है। प्रशासन को यथाशीघ्र सख्त कदम उठाते हुए दोषियों और उन्हे शह देने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करे। ऐसे निंदनीय कुकृत्य की निंदा और बिरोध होना चाहिए। समाज बिरोधी तत्वों को किसी भी प्रकार का संरक्षण न मिले ताकि न्याय व्यवस्था पर विश्वास रह सके।

    उत्तराखंड आये दिन गरीब, कमजोर, असहाय और महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं से शर्मसार हो रहा है चाहे प्रतापनगर (रिंडोल) की प्रीति का उत्पीड़न हो या पौड़ी की अंकिता भंडारी काण्ड के कारण हो या मोरी (सलारा) के आयुष के साथ की गई ज्यादती के लिए हो। दुष्टों का सर्वनाश हो।

    विश्वास है कि शासन-प्रशासन जिस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए युद्धस्तर पर कार्य करेगा और दोषियों को यथाशीघ्र कठोर सजा देगा जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद ना हो और सामाजिक समरूपता और समरसता भी बनी रह सके।

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