भौतिकवाद की बलि चढ़ता जा रहा है आस्था का केंद्र सिद्ध शक्तिपीठ सुरकंडा

0
254
यहाँ क्लिक कर पोस्ट सुनें

भौतिकवाद की बलि चढ़ता जा रहा है आस्था का केंद्र सिद्ध शक्तिपीठ सुरकंडा

रईसों और सुविधाभोगियों की ऐशगाह बनता जा रहा है तीर्थ

रज्जू मार्ग के कारण स्थानीय बाजार में बढ़ गई है वाहनों की बेतहाशा भीड़

स्थानीय लोगों का जीवन बनता जा रहा है नरक

टिहरी गढ़वाल का सर्वोच्च शिखर मां सुरकंडा देवी मंदिर आदिकाल से स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। सिद्ध शक्तिपीठ होने के कारण एक ऐसा स्थल रहा जो स्थानीय लोगों को धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक गति प्रदान करता आया आया है। कुछ वर्षों से धार्मिक आस्था का स्थान भौतिकवाद, पर्यटन और धन कमाऊ केंद्र के रूप में परिलक्षित है।

कद्दूखाल सुरकंडा मंदिर रज्जू मार्ग बन जाने के कारण ठेकेदार की तो करोड़ों की आय हो रही है

कद्दूखाल सुरकंडा मंदिर रज्जू मार्ग बन जाने के कारण ठेकेदार की तो करोड़ों की आय हो रही है लेकिन स्थानीय लोग गुलामों की तरह जीवन जीने को मजबूर हैं। सैकडों वाहन सड़क पर खड़े हैं। पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। हां, सड़क पर पुलिस विभाग ने “नो पार्किंग” के बोर्ड अवश्य लगा लिये हैं जबकि पार्किंग की कोई व्यवस्था नही है। स्थानीय लोगों के मार्ग बंद हो चुके हैं।

स्थानीय काश्तकारों को गृह निर्माण सामग्री,कृषि उत्पादन रखने की जगह नहीं मिल पा रही है। स्थानीय गरीब लोगों के साथ व्यवस्था के नाम पर कभी-कभी असंगत और अनैतिक व्यवहार भी हो रहा है। कुछ समय पूर्व कुछ लोगों के रोजगार के साधन, सड़क के किनारे जीविकोपार्जन के लिए खोखे(छोटी दुकानें) जंगलात के द्वारा तोड़ दिए जाने के कारण एक स्थानीय युवक की सदमें से मृत्यु हो गई थी। कोविड के दौरान नौकरी समाप्त हो जाने के बाद वह किसी तरह अपने बच्चों की परवरिश कर रहा था।

घर-घर नल, घर-घर जल सरकार की महत्वाकांक्षा योजना है और इसी कड़ी में सुरकंडा वॉटर पंपिंग योजना पर करोड़ों रुपए खर्च करके हटवालगांव (सकलाना )से पानी सुरकंडा खींचा गया। जिसका वितरण किया जा रहा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि अधिकांश जल होटल, रेस्टोरेंटों को संयोजित किया जा रहा है और स्थानीय लोगों के घरों पर नल तो हैं लेकिन जल नहीं। नदी घाटी का पानी पंपिंग हो जाने के कारण घाटी के लोग धान की खेती नहीं कर पा रहे हैं। धान की पौध हेतु के लिए पानी नहीं है। धान की खेती जो की घाटी के लोगों का जीवनयापन का एक साधन था वह धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। किस प्रकार का विकास हो रहा है ? यह यक्ष प्रश्न है।

क्षेत्रीय विकास के नाम पर समय-समय पर आवाज़े उठती रही लेकिन योजनाओं का लाभ लेने वाले बड़े लोग रहे हैं। 60 के दशक में चंबा- मसूरी फ्रूट बेल्ट बनी। उसका उद्देश्य था भूमिहीन अनुसूचित जाति और पूर्व सैनिकों को रोजगार पहुंचाना लेकिन उसे दौरान भी बड़े नेताओं,अफसरों,जनप्रतिनिधियों और कुछ समाजसेवियों ने बेल्ट पर कब्जा कर लिया। दिखाने के लिए तो कुछ अनुसूचित जाति के लोगों और पूर्व सैनिकों को लीज पर जमीन दी गई लेकिन वह भी पैसे वाले समर्थ वाले दबंगों ने हड़प ली। आज फ्रूट बेल्ट एक काल्पनिक कहानी बन गया है।

इस दौरान के लोग कैसे मान लें कि फल पट्टी कहां और कैसे रही होगी ? पूरी बेल्ट में कंक्रीट के महलों में तब्दील हो गई। बड़े-बड़े स्टार होटल बन चुके हैं। होटलों के आगे सैकड़ो गाड़ियों का लश्कर खड़ा है। वन भूमि पर खोखे तो तोड़ दिये लेकिन रसूखदारों के कथित दैत्याकार मठ खूब आसमान छू रहे हैं। समस्त चंबा मसूरी बेल्ट के हाल-बेहाल हैं। चंबा से मसूरी तक बड़े-बड़े होटल और रेस्त्रां ही नजर आएंगे। इन होटलों के लिए लाखों लीटर पानी रोज टैंकरों से सौंग घाटी से आपूर्ति की जाती है।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहाड़ों के सुंदरता की जगह कुरूपता नजर आ रही है सब देख रहे हैं। भाषण भी खूब हो रहे हैं लेकिन भाषणों के आड में वोट का खोट मौजूद है। कुछ स्थानीय लोग भी पहाड़ों के प्राकृतिक सौंदर्य, संसाधनों और भूमि को लूटने में लगे हैं। कभी फ्रूट बेल्ट के नाम पर हरे जंगलों को जलाकर कोयला बनाकर बेचा, कभी गरीबों की जमीन ह औने पौनें दामों में बिका कर दौलत कमाने का काम किया। मजाल क्या कि उनके खिलाफ कोई आवाज उठा सके। सर्वहारा वर्ग, सामान्य ईमानदार लोग केवल कुंठित होकर मर रहे हैं। कुछ सरकार के द्वारा फेकें गए चोंगे से ही संतुष्ट है।

आज पहाड़ में पानी कम और शराब ज्यादा है। शराब माफिया की पैठ घर-घर पहुंच चुकी है। शादी- ब्याह, धार्मिक अनुष्ठानों, यहां तक कि श्राद्धकर्म,तेरहवीं में भी शराब की बोतल खनक रही हैं और पेटियां खुल रही हैं। मेहंदी का मतलब तो अब कॉकटेल से ही लोग लेते हैं लेकिन यह ना भूले कि पहाड़ में दो तिहाई जनसंख्या महिलाओं और बच्चों की है और 10 फीसदी लोग शराब नहीं पीते। फिर भी 20% शराबियों का कब्जा 80% लोगों पर साफ झलकता है।

यह नहीं है कि विचारकों, चिंतकों ,पर्यावरणविदों, प्रकृति संरक्षकों,अच्छे नेताओं तथा प्रशासकों को चिंता न हुई हो या इस बारे में कभी सोचा ना हो। समय-समय पर आवाज उठती रही हैं लेकिन मनुष्य की स्मृति छलनी की तरह होती है। लोग जल्दी भूल जाते हैं। और कुछ लोग बहकावे में आ जाते हैं। कुछ असामाजिक और अनैतिक लोग अपने दबाव और प्रभाव के कारण उनके स्वर में स्वर मिलाना शुरू कर देते हैं। इसी कारण सामान्य व्यक्ति मजबूरी, भोलेपन, दरिद्रता, अज्ञानता आदि के कारण अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार देते हैं।

सकलाना क्रांति भूमि रही है और यहां का बलिदान, यहां की क्रांति टिहरी रियासत में जग जाहिर रही है। समय-समय पर ऐसे लोगों ने टिहरी रियासत में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई। श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, मोलू भरदारी तथा असंख्य लोगों का बलिदान आज भी याद किया जाता है।

मां सुरकंडा मंदिर के डेढ़ किलोमीटर नीचे सड़क मार्ग से जहां रज्जू मार्ग बनाया गया है। कद्दूखाल में कहीं पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है।

मां सुरकंडा मंदिर के डेढ़ किलोमीटर नीचे सड़क मार्ग से जहां रज्जू मार्ग बनाया गया है। कद्दूखाल में कहीं पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। संपूर्ण सड़क के दाएं -बाएं की जमीन जंगलात अपनी भूमि बताती है। संज्ञान में आया है की रज्जू मार्ग की आड में रईस लोगों के लिये कैफे की व्यवस्था हो रही है जिसका स्थानीय लोगों ने बिरोध किया है।

मां सुरकंडा मंदिर के डेढ़ किलोमीटर नीचे सड़क मार्ग से जहां रज्जू मार्ग बनाया गया है। कद्दूखाल में कहीं पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। बताया गया कि इसका शीघ्र ही निर्माण कार्य होने वाला है। स्थानीय लोगों के अंदर ज्वाला भड़क रही है क्योंकि रज्जू मार्ग बनने के कारण जिन लोगों की रोजी- रोटी डंडी- कंडी और घोड़े खच्चर को हांक कर निकलती थी वे अधिकांश बेरोजगार हो गए हैं। चंद लोगों को रोपवे में नौकरी मिली है लेकिन अधिकांश घोड़े खच्चर वाले आज भी बेरोजगार हैं। यदि पर्यटन विभाग या ठेकेदार कैफे बनाने की अनुमति देता है तो स्थानीय व्यापारियों की भावनाओं पर कुठारघात होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में कालावन (तेगना) की प्रधान ममता दंदेला ने अनेक प्रधानों के संयुक्त पत्र के साथ श्रीमान जिलाधिकारी महोदय से गुहार लगायी है। अत: सामान्य समन्वित विकास के साथ पर्यटन के स्थान पर तीर्थाान को बढ़ावा दिया जाए। पर्यटन भोग विलास, पहाड़ और प्रकृति का कुरूप चेहरा सम्मुख न लाय बल्कि क्षेत्रीय विकास में स्थानीय लोगों की सहायता करे।

रिपोर्ट: *सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

Comment