तंत्र यदि दूषित हो जाए तो फिर क्रांति भड़क सकती है

    तंत्र यदि दूषित हो जाए तो फिर क्रांति भड़क सकती है
    play icon Listen to this article

    भ्रष्टाचारियों को जेल भेजें। कड़ी सजा मिले। भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि गरीब और बेरोजगारों के पेट पर लात न मार सके। उनकी मेहनत पर डाका न डाल सके। समाज में इस प्रकार की बुराई ब्याप्त न हो, इसके लिए कारगर पहल होनी चाहिए। अन्यथा तंत्र ही यदि दूषित हो जाए तो क्रांति भड़क सकती है।

    *कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

    कुछ समय पूर्व हिंदी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में इरिका ल्यूराटाग का आलेख पढ़ रहा था। सन 1949 की घटना को उन्होंने उद्धृत किया, जब वह एक डॉक्टर के रूप में नेपाल के महाराजा के द्वारा आमंत्रित की गई थी-नेपाल की महारानी का इलाज करने के लिए। उस समय नेपाल में राणा शाही थी और प्रधानमंत्री ही सर्वे सर्वा होते थे। नेपाल नरेश मात्र रबड़ स्टैंप थे। वैधानिक प्रमुख होते हुए भी सत्ताविहीन थे।

    काठमांडू का शाही दरबार बहुत ही सुंदर और आकर्षक था। आलीशान इमारत में महाराजा त्रिभुवन निवास करते थे लेकिन महाराजा नाखुश थे। महाराजा पर प्रधानमंत्री तथा राणा का सख्त पहरा लगा हुआ रहता था। सुरक्षाकर्मियों से लेकर बड़े अधिकारी तक राणा थे। लेखिका की यात्रा से मुझे कोई सरोकार नहीं लेकिन एक बात मेरे दिमाग में आई की लेखिका ने एक स्थल पर लिखा है कि प्रतिवर्ष स्थाई प्रधानमंत्री राज्य की संपत्ति को लूटते गए। राष्ट्र के राजस्व में से प्रत्येक वर्ष 10 लाख पौंड लिया करते थे। राजा को 70 हजार पौंड मिला करता था। कर का शेष भाग जो कभी भी 20% से से अधिक नहीं होता था, जनता के हित में खर्च होता था। आगे लेखिका वर्णन करती है कि विदेशियों को देश का भ्रमण कम करने दिया जाता था क्योंकि वह जनता को भड़का सकते थे। तनिक भी गैर वफादारी होने पर राणा सजा देते थे। एक बार एक व्यक्ति को भारत के महात्मा गांधी का भाषण रेडियो सुुनने के कारण फांसी दे दी गई थी।

    इस तथ्य को पढ़ करके मुझे श्रीलंका के वर्तमान स्थिति का आभास हुआ। जहां देश की जीडीपी का 70% भाग राजपक्षे परिवार की झोली में गया और मात्र 30% भाग देश के विकास कार्यों में लगा। जिसके कारण वहां आर्थिक क्रांति फैैली। परिणाम स्वरूप राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा।

    कमोबेश इसी स्थिति का सामना आज प्रत्येक देश कर रहे हैं। बड़े देशों की बातें ज्यादा सुनी नहीं जाती लेकिन छोटे देशों की बातें यथाशीघ्र हाईलाइट हो जाती हैं। आर्थिक संसाधनों पर राजसत्ता हमेशा डाका डालती रही है। मुझे आदरणीय प्रकांड विद्वान ताराचंद्र त्रिपाठी जी का वह आलेख भी याद आ गया, जिसमें उन्होंने लिखा था कि वह उत्तराखंड को देवभूमि बताकर देवभूमि की सारी राजनीति जाति के जंजाल में उलझी हुई है। प्रदेश का विकास और जनता की समस्याओं के निराकरण के स्थान पर धर्म, जाति के जंजाल में उलझी हुई है। मुख्यमंत्री यदि ब्राह्मण है तो पार्टी का अध्यक्ष ठाकुर होना चाहिए। लगता है सचमुच देवभूमि के निवासी हैं। जिस्म संसार में और मानसिक रूप से स्वर्गस्थ। क्या इस मानसिकता के लिए 2 मिनट का मौन रखा जा सकता है? प्रखंड विद्वान अपने आलेख में बताते हैं कि किस प्रकार से विज्ञापन के प्राचीन रूप नये रुप में प्रभावी होते हैं। वे कहते हैं,

    “कलावती भगवान श्री सत्यनारायण का प्रसाद लेने से चूक गई, भगवान श्री सत्यनारायण ने उसके पति को डुबो दिया। जैसे उसने अपनी भूल स्वीकार की और प्रसाद ग्रहण किया, तालाब में लंबे अंतराल तक डूबा उसका पति जीवित हो गया। यह सब विज्ञापन के प्राचीन रूप है।”

    विश्व प्रगति के दौड़ में कोसों आगे चला गया और हम अपनी देवभूमि को लेकर बैठे रह गये। गति और प्रगति में बहुत पीछे। यह देवभूमि आम जनता को भ्रमित करने और सुविधा भोगी वर्ग द्वारा उनका ध्यान मूल समस्याओं से हटाने का प्रयास करने का पर्याय बन गया। उन्होंने एन.जी.ओ. जनता के करोड़ों रुपए का उपयोग करते हुए पुराण (कागजी कार्यवाही) लिख रहे हैं ।आज भी हमारे बुद्धिजीवियों को अपने तक सीमित गढपति, सम्राट अशोक से भी महान लगता है।

    इस प्रकार के अध्ययन से मन में अनेक प्रकार के विचार आते हैं। वर्तमान समय में उत्तराखंड राज्य अधीनस्थ चयन सेवा आयोग के द्वारा समय-समय पर की गई प्रतियोगी परीक्षाओं के संदर्भ में बहुत ही निराशाजनक और खेदजनक तथ्य सामने आए हैं। जिन लोगों को हमने वोट देकर चुना, अपना मसीहा बनाकर के विधानसभा में भेजा, वही लोग नागरिक अधिकारों पर डाका डालते हुए नजर आए! छोटे-मोटे कर्मचारी तो रिश्वत के लिए बदनाम रहते ही थे। यह उनकी मजबूरी रही हो या नियत में खोट। चुने हुए जनप्रतिनिधि जो हमारे रोल मॉडल होते हैं, जिनके लिए हम सड़कों पर भिड़ जाते हैं ,जिनके प्रति हमारी निष्ठा होती है, जिन लोगों के प्रति हमारा अधिक विश्वास होता है और उनकी विचारधारा के लिए हम कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं, जब तथ्य उजागर होते हैं या इन तथाकथित देवताओं को जब हम पढ़ते हैं कि भाई -भतीजावाद के चक्कर में, धन संपत्ति अर्जित करने के चक्कर में, नाले-खाले की जमीनों पर कब्जा करने के चक्कर में, यह किसी भू माफिया, अपराधी और लुटेरों से कम नहीं है! सफेदपोश- पाप कर्म से अच्छा आमने-सामने की लड़ाई है।

    प्रजातंत्र की बुनियाद स्वस्थ सामाजिक समानता और सब के लिए अवसर प्रदान कराने की अवधारणा पर निहित है। लगता है कि कुछ गद्दारों ने संविधान की कसम झूठी खाई है और संविधान के प्रति भी इनके मन में श्रद्धा नहीं है। ये जन गण मन का राग केवल अपने लाभ के लिए करते हैं और इनकी करनी और कथनी में इतना बड़ा अंतर है।

    उत्तराखंड राज्य बनने के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों को सत्ता पर काबिज होने का अधिकार मिला। उत्तराखंड क्रांति दल के भी कुछ नेताओं ने चुनाव जीता लेकिन वह भी कांग्रेस और भाजपा में चले गए। संसाधनों की लूट का दौर शुरू हुआ। जिस लक्ष्य के लिए उत्तराखंड राज्य बना था, वह अपने लक्ष्य पर नहीं पहुंच पाया, भटक गया। सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है जब अपने ही लोग अपने लोगों को निगलने लगे। नकल माफिया, शराब माफिया, भू माफिया, खनन माफिया, तमाम तरह के माफियाओं की मौौ हो गयी। राजनीतिक संरक्षण ही नहीं बल्कि राजनीतिक नेताओं की लिप्तता भी प्रकट हुई। जिसका आज प्रत्यक्ष प्रमाण है।

    सबसे बड़ी बात यह है कि विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष की घिनौनी भूमिका समाचार पत्रों में मोटी मोटी हेडलाइंस बन रही हैं और बेशर्मी इस बात की है कि सीनातान के का रहे हैं कि अपनी बहू -बेटी को ही तो नौकरी लगाया! गरीब- किसान और मजदूर का बेटा कर्ज मांग कर आवेदन करता है। दूर दराज क्षेत्र के लोग परीक्षा में सम्मिलित होते हैं लेकिन माफियाओं की कारगुजारी के कारण प्रतिभाओं का हनन होता रहता है। यदि इसी प्रकार से चलता रहा तो उत्तराखंड एक नई क्रांति के लिए अवसर उत्पन्न हो रहा है।

    भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों, मुनाफाखोरों और भाई भतीजावाद करने वाले लोगों के खिलाफ जनाक्रोश भड़क सकता है। इसके लिए श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, जैसे नायकों को उत्पन्न होना होगा। हो सकता है कि कुछ लोगों को बलिदान भी देना पड़े। नेक कार्य के लिए बलिदान देना भी एक सौभाग्य की बात है।

    इसलिए अभी अपेक्षा है कि ऐसे भ्रष्ट लोगों की काली करतूतों से पर्दा हटाया जाए। केवल जांच ही न की जाए, बल्कि उन को दंडित किया जाए। सजा मिले। चाहे कोई कितना भी बड़ा आदमी क्यों ना हो, आगे कुछ वर्षों तक इस प्रकार का कुकृत्य करने का साहस नही करेगा। मानव प्रवृत्ति बढ़ी कुरूप होती है। एक अच्छाई समय अनुसार बुराई में बदल जाती है लेकिन क्रांति के द्वारा वह बुराई समाप्त हो जाती है और नई व्यवस्था कायम होती है।

    हमारे प्रदेश के मान. मुख्यमंत्री श्री धामी जी बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। उत्तराखंड का भविष्य उनके हाथ में है। बिना किसी भय-पक्षपात के कार्य करेंगे तो जनता उनका साथ देगी और ईश्वर उनकी सहायता करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

    भ्रष्टाचारियों को जेल भेजें। कड़ी सजा मिले। भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि गरीब और बेरोजगारों के पेट पर लात न मार सके। उनकी मेहनत पर डाका न डाल सके। समाज में इस प्रकार की बुराई ब्याप्त न हो, इसके लिए कारगर पहल होनी चाहिए। अन्यथा यदि तंत्र ही दूषित हो जाए तो क्रांति भड़क सकती है।

     

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here