जान जोखिम में डालकर हिंसक गुलजार से संघर्ष करने वाले वन कर्मियों को पुरस्कृत किया जाए

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    जान जोखिम में डालकर हिंसक गुलजार से संघर्ष करने वाले वन कर्मियों को पुरस्कृत किया जाए
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    जान जोखिम में डालकर हिंसक गुलजार से संघर्ष करने वाले वन कर्मियों को पुरस्कृत किया जाए

    प्रश्न यह नहीं कि वनकर्मियों ने जान जोखिम में डालकर हिंसक गुलजार से संघर्ष किया बल्कि प्रश्न यह है कि इस प्रकार से संघर्ष करने वाले वन अधिकारियों और वनकर्मियों को पुरस्कृत किया जाए या उचित सम्मान दिया जाए।

    देवप्रयाग विधानसभा के मलेथा में गुलजार ने वन अधिकारी और दो वन कर्मियों को घायल कर दिया। क्षेत्रीय विधायक विनोद कंडारी ने भी यह दृश्य देखा। वन विभाग के शूटर ने गुलदार को ड्रोन की मदद से खोजकर ढेर किया।

    वन्य जंतु सुरक्षाअधिनियम पारित होने के बाद वन्य प्राणियों की हिंसा निषिद्ध है। इसके साथ ही कैट प्रजाति का शिकार करना बिल्कुल ही (विषम परिस्थितियों के बाद ही) प्रतिबंधित है। यदि बाघ आदमखोर हो जाए तो भरसक उसे पकड़ने की कोशिश की जाती है लेकिन अति हिंसक होने के बाद ही उसे शासन- प्रशासन से या विभाग से मारने की अनुमति दी जाती है लेकिन तब तक यह अनेकों मानव और घरेलू पशुओं को मार देता है। ड्रोन के सहायता से इस गुलदार को जब देखा गया, उसके बाद ही हिंसक गुलदार को मारा गया और जनता ने राहत की सांस ली।

    प्रश्न यह नही कि हिंसक गुलदार को मारा गया है या मानव और आदमखोर के बीच संघर्ष की गाथा क्या है? बल्कि प्रश्न यह है की वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी जान को हथेली में धरकर जब इस प्रकार का अभियान चलाते हैं और लोगों की जान को बचाने के लिए हिंसक प्राणियों से संघर्ष करते हैं तो कभी-कभी उन्हें स्वयं की जान दे देनी पड़ती है। वे हिंसक पशु के द्वारा घायल कर दिए जाते हैं। यदि जीवित रह गए तो इसका खामियाजा कुछ कोआजीवन भोगना पड़ता है।

    इसी परिप्रेक्ष्य में कुछ वर्षों पूर्व सेवानिवृत हुए वन विभाग के वन दरोगा प्रेम दत्त थपलियाल से मिला। गुलदार के साथ संघर्ष करते हुए सेवा के दौरान वे घायल हो चुके थे। वन विभाग ने तब समुचित इलाज कराया था। ₹15000 चिकित्सा प्रतिपूति के प्रदान किये (तथ्य उन्हीं के अनुसार हैं) लेकिन सिर और गले के जिस भाग पर गुलदार के दांत और नाखून लगे, उस भाग में आज भी कभी-कभी वेेदना होती है। कभी शरीर लड़खड़ा जाता है, तो कभी उन्हें चक्कर आने लगते हैं। दवाइयां नियमित लेते हैं।

    दुर्भाग्य की बात यह है कि इस जाबांज वन कर्मी(अब सेवानिवृत) को जिसने लोगों की जान बचाने के लिए अपनी जान संघर्ष में झोंक दी थी, हिंसक गुलजार के साथ संघर्ष किया, किसी प्रकार से बच भी गए, ईश्वर का शुक्रिया कि वह गुलदार आदमखोर नहीं था वरना उनकी जान भी जा सकती थी ,श्री प्रेम दत्त थपलियाल को शासन- प्रशासन या विभाग की ओर से इस वीरता के लिए कभी कोई सम्मान नहीं दिया गया और सेवानिवृत्ति के बाद तो उनकी कोई सुध लेने वाला भी नहीं है। अक्सर दवाइयां के सहारे वह चल रहे हैं।

    जरूरत इस बात की थी कि विभाग के उच्च अधिकारी इस प्रकरण को शासन और प्रशासन के संज्ञान में लाते और इस जांबाज कर्मचारी को सेवा काल के दौरान पुरस्कृत किया जाता तो अच्छा रहता। लेकिन जब ऐसी घटनाएं घटित होती है तो अचानक ध्यान उस ओर केंद्रित होता है और शासन- प्रशासन तथा विभाग से अपेक्षा की जाती है कि ऐसे कर्तव्यनिष्ठ वनकर्मियों को यथा समय उनके जीवन काल में ही अवश्य कोई सम्मान मिलना चाहिए, जिससे विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों का मनोबल ऊंचा रह सकेगा और वे समुचित रूप से अपनी सेवाओं का निर्वहन भी करेंगे। जान जोखिम में डालकर समय-समय पर इस प्रकार के हिसक प्राणियों या वनाग्नि से जंगल तथा मानव जीवन की रक्षा कर सकेंगे।

    *कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

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