जहां मौंंण मेला और मरोज का त्यौहार आज भी जीवंत हैं लेकिन डाट्या कुठार, तिबार, निमदरीयां आदि विलुप्ति के कगार पर हैं

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जहां मौंंण मेला और मरोज का त्यौहार आज भी जीवंत हैं लेकिन डाट्या कुठार, तिबार, निमदरीयां आदि विलुप्ति के कगार पर हैं। जी हां! यह थत्यूड है। विकासखंड जौनपुर ( टिहरी गढ़वाल) का मुख्यालय। पालीगाड (थत्यूड से आगे अगलाड) नदी घाटी के किनारे अवस्थित। जौनपुर का जाना माना व्यापारिक प्रतिष्ठान है थत्यूड।

@सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

यद्यपि यह इतना पुराना नहीं है जितना कि जौनपुर का इतिहास। विकासखंड मुख्यालय होने के कारण इसकी भी अहमियत बढ गयी है। आजादी के बाद प्रशासनिक इकाइयों के गठन होने के बाद 01 जनवरी 1956 को विकासखंड मुख्यालय कैंपटी में बनाया गया था लेकिन 05 वर्ष बाद इसे थत्यूड में स्थापित किया गया। तत्कालीन ब्लाक प्रमुख हरिसिंह कैंंतुरा का इसमें बड़ा योगदान रहा। बस, तभी से थत्यूड का विकास होना शुरू हुआ।

यूं तो थत्यूड में अक्सर जाना -आना पूर्व में भी होता रहा लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद अनेकों बार ऐसा मौका मिल जाता है। 50 वर्ष पहले के थत्यूड और आज के थत्यूड में जमीन और आसमान का फर्क है। 50 वर्ष पूर्व दूरस्थ स्थान होने के कारण आवागमन की सुविधा नहीं थी। घोड़े खच्चरों के सहारे और पैदल चलकर ही लोग मुख्य मार्ग पर आते थे। मसूरी से 32 किलोमीटर दूर यह स्थान है। आज सुवाखोली होते हुए आसानी से थत्यूड में पहुंचा जाता है लेकिन चार- पांच दशक पूर्व पैदल ही जाना -आना हुआ।

40 वर्ष पहले थत्यूड में ताऊजी की दुकान थी उनका व्यापारिक प्रतिष्ठान अपने स्वर्णिम- काल में था। वहीं से चाचा जी भी जड़ी- बूटियों का व्यवसाय करते थे और खूब अर्थोपार्जन किया। ताऊ जी विधुर थे लेकिन एक महामानव थे। स्थानीय घी, दाल, धान आदि से दुकान भरी रखी थी और उनकी मूंगफली की बोरी का मुंह ग्राहकों के लिए खुला रहता था। 90 के दशक की शुरुआत में ताऊ जी ने दुकान छोड़ दी और गांव में ही अपनी छोटी सी दुकान चलाते रहे । 12 वर्ष तक ग्राम पंचायत हवेली के प्रधान भी रहे।

सन 1973 का साल हमारे जीवन में बहुत मनहूस साल रहा। परिवार का बंटवारा हुआ। मेरी चाची बीमार हो गई। घोर गरीबी में रहने के कारण चाचा जी ने इलाज के लिए ₹40 कर्ज लिए थे और उन्हीं का भुगतान न होने के कारण सन 1974-75 में भाई ने पढाई छोड़कर ताऊ जी की दुकान पर घरेलू नौकर के रुु में कार्य किया। कर्जा तो निपट गया लेकिन भाई की पढ़ाई बाधित हो गई।
मेरा तो भगवान ही मालिक था ! मैंने तो भाई से एक साल पूर्व ही विद्यालय छोड़ दिया था। कुछ समय बाद भाई उत्तरकाशी निकल गया। नौकरी की तलाश में मारा- मारा फिरता हुआ वह लम्बगांव पहुंचा। स्व. श्री ललिता प्रसाद गैरोला जी (वन क्षेत्राधिकारी) के यहां घरेलू नौकर के रूप में काम किया। उन्हीं के सेवाओं का उसे प्रतिफल मिला और पहले खूंठ मोहर्रम और बाद में वनरक्षक के रूप में उसकी नियुक्ति हुई। लंबी सेवा करने के बाद फॉरेस्टर पद रिटायर हुआ और अगले साल ही जीवन से भी। ओह! बात कर रहा था थत्यूड की लेकिन अतीत की स्मृतियों में डूबता हुआ विचलन उत्पन्न हो गया! हमारा जौनपुर यमुना नदी के किनारे अवस्थित, (विराल्टा गढ)विराट गढ की शीतकालीन राजधानी, महिला प्रधान क्षेत्र, धनधान्य से परिपूर्ण, नदी घाटियों और जैव विविधताओं से भरा हुआ क्षेत्र, ऐसा जौनपुर जिसकी भारत में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, आज भी संस्कृति और खेलों के क्षेत्र में जौनपुर का कोई सानी नहीं है।

एक और जमुना नदी के किनारे से और सुरकंडा पर्वत तक उपत्यकाओं के मध्य बसा हुआ, देहरादून जिले तक फैला हुआ, विविधताओं का क्षेत्र यह जौनपुर है। उत्तरकाशी (रवाईं) और जौनसार की संस्कृति से ओतप्रोत अपना अद्वितीय स्थान रखता है। प्रशासनिक इकाई बन जाने के बाद भले ही राजनीतिक रूप से जौनपुर बदल गया हो लेकिन सांस्कृतिक मूल्यों में अब भी बदलाव नहीं दिखाई देता है।

सन 1952 में जयेेंद्र सिंह बिष्ट जौनपुर लोक परिषद से सदस्य चुने गए। उसके बाद राम चंद्र उनियाल, ठाकुर किशन सिंह, बलदेव सिंह आर्य, बर्फिया लाल जुंबाठा ज्ञान चंद, कौलदास, नारायण सिंह राणा, खजान दास, महावीर रांगड और वर्तमान में प्रीतम पंवार क्षेत्रीय विधायक के रुप में जाने -पहचाने नाम है।स्व. सूरत सिंह अस्वाल और सोमवारी लाल उनियाल का नाम कौन नहीं जानता ? जिन्होंने ब्लाक प्रमुख होते हुए अपनी विशिष्ट छवि बनाई। इसके अलावा सरदार सिंह रावत, कुंदन सिंह पंवार, मीरा देवी,गीता रावत,कुंवर सिंह रावत और वर्तमान में सीता रावत जमीन से जुड़े हुए लोगों ने ब्लाक प्रमुख का दायित्व बखूबी निभाया और निभा रहे हैं।

क्षेत्र के सदानीरा गाड- गदनें और छोटी नदियों से आच्छादित जौनपुर का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है। सॉन्ग, अगलाड पालीगाड, भद्री, बांदल नदियों से लेकर महान यमुना नदी के किनारे अवस्थित यह क्षेत्र आदिकाल से ही महान पुरुषों की शरणस्थली रहा है। आज भी थत्यूड का पनीर टमाटर, साग-सब्जियां तथा धान पूरे उत्तराखंड में उल्लेखनीय है।

स्वर्गीय महिमानंद कोहली का ‘हरिजन छड़ी उद्योग सहकारिता लिमिटेड, थत्यूड अपने समय में फलता- फूलता व्यवसाय था। घी और दूध की नदियां जिस क्षेत्र में बहती हों, जिस क्षेत्र के जल से देहरादून जैसे शहर का विकास हुआ हो, जहां सरकंडा, नागटिब्बा,भद्रराज जैसी चोंटियां हो, ऐसा अनुपम क्षेत्र जौनपुर और उसका विकासखंड मुख्यालय थत्यूड हर समय क्षेत्रीय और स्थानीय लोगों के दिल में धड़कता है।

विश्व स्तर पर खेलों के लिए अपनी धाक जमाने वाले जसपाल राणा, आदर्श महिला प्रतिनिधि श्रीमती मीरा सकलानी, सीता रावत, गीता रावत, सुलोचना परमार आदि के अलावा अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक व्यक्तित्व इस क्षेत्र में उत्पन्न हुए हैं।

सरदार प्रेम सिंह, ईश्वरी दत्त गौड़, इंद्र मोहन डोभाल,नैन सिंह,हुकम सिंह पंवार, जगदीश शाह, सुभाष रमोला,अखिलेश उनियाल, राजेन्द्र कोहली,अमरेंद्र बिष्ट,वीरेंद्र रावत, विनोद कोहली,बिजेंद्र पंवार, वीरेंद्र राणा,आदि अनेकों क्षेत्रीय प्रतिभाएं रही और हैं,आज भी लोगों के मन मस्तिष्क में राज करती हैं। थत्यूड का नाम आए और पं.गिरधारी लाल लेेखवार को भूल जाएं तो उचित नहीं होगा। जौनपुर के विकास में उनका अतुलनीय योगदान रहा है। लातूर, सिलवाड, इन्डवालस्युं, पालीगाड,दसजूला, छैैजूला और सकलाना सात पतियों से बना जौनपुर अद्वितीय है।

थत्यूड के समीपस्थ क्षेत्रों अलमस,भवान, रौतू की बेली, मौरियाणा आदि का द्रुत गति से विकास हो रहा है। अधिकांश क्षेत्रों में पर्यटन केंद्र बन रहे हैं और कृषि भूमि तो कंक्रीट के बड़े-बड़े महलों, होटल- रेस्तरां, रिजाल्ट निगल रहे हैं। कृषि भूमि पर होमस्टे जैसे आजीविका के साधन उत्पन्न हो रहे हैं। पर्यटन विकास बुरी बात नहीं है लेकिन यदि लोक- संस्कृति, लोक- जीवन, लोक-सभ्यता पर यह प्रहार करती है तो इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता। जिस संस्कृति को हमारे पूर्वजों ने सदियों से अक्षुण्य बना कर रखा है तथाकथित विकास की अंधी होड़ में कहीं यह संस्कृति विलुप्त हो जाए।आज भी मौंण मेला और मरोज का त्यौहार जीवंत है लेकिन डाट्या कुठार विलुप्ति के कगार पर है।

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