गुड़हल का फूल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है

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    गुड़हल का फूल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है
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    गुड़हल का फूल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है

    गुड़हल का फूल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। फूल तो फूल होता है लेकिन जिस फूल में शूल नहीं होते उसे मै सबसे सुंदर फूल मानता हूं। फूल तो गुलाब का भी सुंदर है लेकिन उसमें शूल हैं। इसलिए मैं उसे श्रेष्ठ नहीं मानता हूं।

    @कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

    गुड़हल का फूल सौभाग्य, समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए मेरी धर्मपत्नी इसे पंजाब से लाई थी जो आज भी मेरे गमले पर स्थित है। फूल, पौधों और बच्चों की बड़ी परवरिश करनी पड़ती है। बिना परवरिश के मुरझा जाते हैं, कुम्हला जाते हैं, सूख जाते हैं और झर जाते हैं।

    फूलों की भी अपनी दुनिया है। सुंदरता देते हैं, सुगंध उत्पन्न करते हैं, सच कहूं तो ये मस्तिष्क की खुराक हैं! किताबों में गुड़हल का फूल बहुत देखा और पढ़ा। चित्रकला में भी कई बार पठन-पाठन के समय गुड़हल के फूल को आर्ट कॉपी पर चित्रित किया लेकिन जब मेरे घर गमले पर यह फूल मुस्कुराने लगा तो असीम हर्ष का अनुभव हुआ है।

    बड़ी बात यह है कि जब मेरी पत्नी अपनी बहन को मिलने के लिए एक बार पंजाब गई तो वहां से यह फूल बहुत ही सावधानी पूर्वक एक प्रतीक चिन्ह के रूप में अपने पहाड़ के उत्तराखंड लाई थी। यह शहरी फूल था इसलिए बहुत लंबे समय तक सावधानीपूर्वक पहाड़ की आबोहवा के अनुकूल इसे ढालना पड़ा। परिवार के अन्य सदस्यों का भी इसमें योगदान है।

    मैं तो सौंदर्य का उपासक हूं। जब फूल खिलने लग गया तब उस पर ध्यान दिया। लेकिन परिवार जनों की तपस्या का यह प्रतिफल है कि आज यह फूल कई बार वर्ष भर में मेरे दरवाजे के सामने इतराता है। मेहमानों का स्वागत करता है। घर की सीढियां चढ़ते समय, प्रथम दृष्टि इस गुड़हल के फूल पर पड़ती है। किसी भी आगंतुक के आने पर यह नमन करता है। यह गुड़हल का फूल सिर झुका कर, प्रसन्नता से, आनंद से विभोर होकर, मस्तिष्क में प्रसन्नता का रस भरता है और बना देता है, एक ‘अमृत का सागर’ !

    भगवान भास्कर की प्रथम किरणों के साथ, शीश उठाए हुए, कमर झुकाए हुए, यह पुष्प अभिनंदन करता है। उस प्राची के दिव्य पुष्प का जो दिनभर क्रीड़ा करता, गतिमान प्रतीचि के कोने में अस्त हो जाता है। उनका जीवन भी रोज मुस्कुराने और झरने के लिए ही बना है।

    समय की गति के अनुसार यह मां धारी देवी की मूर्ति के समान,हमारी मानसिकता के अनुसार, अपना रंग-रूप बदलता है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रवेश द्वार पर लगाने के योग्य है क्योंकि इसमें शूल नहीं हैं। भूलकर भी शूल वाला फूल प्रवेश द्वार पर नहीं लगाना चाहिए।

    ऐसी हमारी मान्यता भी है। इसीलिए बेचारा गुलाब भले ही वह आगरा का गुलाब है, कनस्तर में घर के पिछवाड़े में अपने शोभा बढ़ा रहा है। मेहमानों को उसे दिखाना पड़ता है। जो उस फूल को नजदीक जाकर के देखता है, सूंघता है, प्रसन्नता का अनुभव करता है। उसे भी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं कि कहीं कोई कांटा हाथ में ना चुभ जाए। गुड़हल के साथ ऐसी बात नहीं है।

    मैं अपने धर्म पत्नी का आभार व्यक्त करता हूं जिसने संजीदगी से इस गुड़हल के पुष्प-पौधे को रोपित, पोषित किया और उसका लक्ष्य है कि घर के गमलों और फुलवारी में असंख्य गुड़हल के फूल खिलें जो जीवन को एक नई ताजगी प्रदान करते रहेंगे।

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