कविता- समय से न्याय मिला ना !

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कविता: यह स्वच्छता क्रांति परिचायक हो!
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कविता- समय से न्याय मिला ना!

गर्म तवे से बहू जलायी, सास-ननद ने की हैवानी,
मुंह के अंदर कपड़ा ठूंसा,
कैैसे कर भाई ने जान बचाई!

क्यों बेशर्मों को शर्म नहीं आयी।
पहाड़ की बेटी नदी डुबायी,
उत्पीड़न कर हत्या कर दी,
कुकर्मी कायर बुजदिल पापी ने,
शोषण  कर क्यों बेटी मार दी!

लीता -पूती की  सरकारें,
पंगु प्रशासन राज- पटवारी!
काला कानून न्याय भी अंधा,
क्यों गले चढा नही देते फंदा!

इनकाउंटर क्यों नहीं कर देते!
क्यों पब्लिक को ही सौंप न देते?
पुलकित पापी का सर कुचल कर,
क्यों शीघ्र  बेटी को न्याय नही देते!
जो हत्यारे की करे पैरवी,
वह भी पाप समर्थक है।
कुकर्मी पापी पुलकित का,
यथाशीघ्र सर्वनाश जरूरी है।

अगर समय से न्याय मिला ना,
फिर पब्लिक न्याय करेगी।
खट्टे वृक्षों -चौराहों पर,
सरेआम लटकाकर मारेगी।

*सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

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