उत्तराखंड की स्थिति आज दयनीय है, विशेष कर टिहरी जनपद की

अस्तित्व बचाने को लालायित है राजनीतिक अदूरदर्शिता का शिकार हुआ संसाधनों से परिपूर्ण रानीचौरी परिसर
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उत्तराखंड की स्थिति आज दयनीय है, विशेष कर टिहरी जनपद की। सीमित क्षेत्र का अवलोकन कर यदि गोबिंद बल्लभ पन्त कृषि विश्व विद्यालय के पर्वतीय परिसर रानीचौरी के विषयक जानकारी ली जाय तो वर्ष 1975 में जब हेमवती नन्दन बहुगुणा जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब एक प्रस्ताव बना और पर्वतीय विकास विभाग बनाकर रानीचौरी में कृषि विश्व विद्यालय का पर्वतीय परिसर बनाया जाय।

तदनन्तर 1976 में यह परिसर बना था, जिसके लिए रानीचौरी क्षेत्र की जनता ने अपनी कृषि भूमि, खेत खलिहान, चारागाह, वन व जल अर्पित किए, परन्तु उत्तराञ्चल बनने के बाद वर्ष 2001 जून में उद्यान विभाग के बागीचे भरसार पौड़ी गढ़वाल में औद्यानिकी महाविद्यालय के उदघाटन हेतु सावली के कुछ मनीषियों ने पूजा अर्चना कर तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नित्यानंद स्वामी व वित्त मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक से भरसार महाविद्यालय का विधिवत उद्घाटन करवाया/ किया, फिर नवम्बर सन् 2001 में पन्त नगर विश्व विद्यालय के माननीय कुलपति प्रो गौतम जी से भवनों का शिलान्यास भी करवाया। 2006 में रानी चौंरी परिसर को श्री नारायण दत्त तिवारी जी ने विश्व विद्यालय ‘औद्यानिकी एवं वानिकी’ दर्जा देकर बनाया। जो राजनैतिक षड्यंत्र से रानी चौंरी न बनवा कर वर्ष 2011 में भरसार बनाया गया। रानी चौंरी क्षेत्र की सु सुप्त जनता ने कुछ भी सकारात्मक कार्यवाही नहीं की। खैर कार्य महत्वपूर्ण होता है।

इस क्षेत्र के कुछ मनीषियों ने वर्ष 2016 -17 में एक संघर्ष समिति का गठन किया व रानीचौरी परिसर को बचाने का प्रयास किया। एक समझौता भी हो रखा है कि प्रभावित आठ गांवों के बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, वर्ष 2017 में सौभाग्य से श्री सुबोध उनियाल जी कृषि मंत्री बने और उनसे लगातार यह प्रार्थना की कि इस परिसर को बचाने का प्रयास कीजिए, और गत वर्ष अगस्त 2021 से अनेक बार अनुरोध/प्रार्थना हेतु संघर्ष समिति मंत्री जी से (कई बार) मिली भी, पर मंत्री जी ने कुछ नहीं किया बल्कि अपने पद की गरिमा के विपरीत कुछ अपने चहेतों को उपनल में जहां स्थान भी रिक्त नहीं हैं लगवाया।

आज नए कुलपति की नियुक्ति हेतु विज्ञप्ति प्रकाशित हो चुकी है, कुलपति, वैज्ञानिक, कर्मचारी आएंगे और चले जाएंगे पर रानीचौरी का यह क्षेत्र यहीं रहेगा व इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। गत वर्ष कुछ नियुक्तियां उत्तराखंड में जैसे आजकल भ्रष्टाचार के चलते दिखाई दे रहा है वैसे ही हुई हैं परन्तु यदि उनकी जांच होगी तो कोई न कोई हमारा ही आपसी उस आंच में दग्ध होगा।

गत वर्ष तो अवैधानिक नियुक्ति न करने हेतु जब किसी ने मुखरित होकर कहा तो श्याम को उसे मंत्री महोदय का फोन आ गया कि “बहुत बड़ा नेता बन गया है”। हमारा उद्देश्य नौकरी दिलवाना है और उन्हें जो पिछले दस पन्द्रह सालों से फावड़ा, गैंती चला रहे हैं। अब इसका उत्तरदायित्व हमारा नहीं तो और किसका है? शायद यह हर किसी की पीड़ा का विषय हो सकता है, अतः इस हेतु यह पोस्ट अप्रासंगिक नहीं हो सकती है। कुछ न कुछ सकारात्मक कार्यवाही/ प्रयास किया जाना अपेक्षित व आवश्यक प्रतीत हो रहा है। अन्यथा क्षेत्र, जनपद या प्रदेश की खुशहाली नहीं हो सकती है।

विशेष कर इस क्षेत्र की, मेरा अनुरोध है कि ईमानदारी से काम करने की जरूरत है जिसे पूरा होना आवश्यक है, विचार अलग-अलग हो सकते हैं, पर देश-प्रदेश पहले है, अतः यहां के प्रबुद्ध जन अपने हितों की रक्षा के लिए आगे आएं। तमासा बन गया है यदि कृषि विज्ञान केन्द्र की कोई गोष्ठी होती है तो स्थानीय लोगों को कोई सूचना नहीं व जौनपुर, भिलंगना, प्रतापनगर के लोगों की उपस्थिति? विचारणीय, मननीय? यह पोस्ट भले ही अप्रासंगिक लगे पर कहीं न कहीं विचारणीय अवश्य है।

रिपोर्ट: आचार्य हर्षमणि बहुगुणा

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