उत्तराखंड की संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतने ही मन को मोहने वाले यहां के लोकगीत-नृत्य भी हैं: लोकगीत कलाकार राजेश कुमार

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उत्तराखंड की संस्कृति

संगीत और संस्कृति का संरक्षण आज की जरूरत

उत्तराखंड की संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतने ही मन को मोहने वाले यहां के लोकगीत-नृत्य भी हैं। यह बात लोकगीत कलाकार राजेश कुमार ने पंडित ललित मोहन शर्मा श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय परिसर ऋषिकेश के सात दिवसीय शिविर के बौद्धिक सत्र में हमारी सांस्कृतिक विरासत लोक संगीत विषय पर चर्चा के दौरान कही।

पंडित ललित मोहन शर्मा श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय परिसर ऋषिकेश के सात दिवसीय शिविर के बौद्धिक सत्र में हमारी सांस्कृतिक विरासत लोक संगीत विषय पर चर्चा हुई, बौद्धिक सत्र में आए लोकगीत कलाकार राजेश कुमार द्वारा स्वयंसेवियों का लोकगीत गाकर मन मोह लिया।

राजेश कुमार ने स्वयंसेवियों को संबोधित करते हुए मैं पौड़ी जिले राजबाटा गांव का मूल निवासी हूं, मुझे बचपन से ही संगीत का बहुत ही शौक था, जब भी स्कूलों में कोई भी प्रोग्राम होता था वहां पर मैं प्रथम स्थान प्राप्त करता था। सांस्कृतिक प्रोग्राम मेरे हर समय होते रहते थे, मैंने सांस्कृतिक प्रोग्राम पहली बार स्कूल में प्रस्तुत किया, लेकिन उस समय वहां पर इतना सुविधा नहीं थी कोई हमें कु कोई संगीत के बारे में कुछ ज्ञान दे सकेI अभी हाल ही में मेरे गढ़वाली लोक गीतगीत समुद्र मा अब सेतु बंधेगेआने वाला हैI

उन्होंने लोक संगीत पर चर्चा करते हुए उत्तराखंड की संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतने ही मन को मोहने वाले यहां के लोकगीत-नृत्य भी हैं। यहां लोक की विरासत समुद्र की भांति है, जो अपने आप में विभिन्न रंग और रत्न समेटे हुए है। हालांकि, वक्त की चकाचौंध में अधिकांश लोकनृत्य कालातीत हो गए, बावजूद इसके उपलब्ध नृत्यों का अद्भुत सम्मोहन है। लोकनृत्यों तथा लोकगीतों का सीधा संबंध हमारी संस्कृति से है।

इन लोकगीतों एवं नृत्यों के माध्यम से हम सदियों से अपनी समृद्ध संस्कृति को अब तक बचाए रखने में सफल रहे हैं। भारत में विभिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के नृत्य किए जाते हैं। इन नृत्यों के साथ गाए जाने वाले गीतों की विषय वस्तु मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न पड़ावों पर आधारित होती है।

इन गीतों में उस समय के राजाओं की प्रशंसा तथा समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों का बखान किया जाता था। गीतों के माध्यम से उस समय की सामाजिक व्यवस्था को जानना अति सरल हो जाता था।

भारतीय संस्कृति के संरक्षण हेतु भारतीय संगीत का संरक्षण बहुत ज़रूरी

डॉ प्रीति खंडूरी ने कहा भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए भारतीय संगीत का संरक्षण बहुत ज़रूरी है। विद्यालय स्तर से बच्चों को संस्कृति से जुड़े विषय पाठ्यक्रम में अनिवार्यता के साथ पढ़ाए जाने चाहिए।

NSS के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अशोक कुमार मैन्दोला, डॉ पारूल मिश्रा एवं स्वयंसेवी भी उपस्थित रहे।

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