आतुर काल में किया गया दान व्यक्ति की अतृप्त इच्छाओं को करता है पूरा

    विवाह संस्कार मौज मस्ती के लिए नहीं अपितु जीवन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए है


     

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    आतुर काल में किया गया दान व्यक्ति की अतृप्त इच्छाओं को करता है पूरा

    आतुर काल में किया गया दान व्यक्ति की अतृप्त इच्छाओं को पूरा करता है। मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ मनुष्य की यह पाँच वस्तुएँ जाती हैं। अतः भारतीय विद्वानों का मानना है कि व्यक्ति की अन्तिम इच्छा की पूर्ति अवश्य करनी चाहिए।

    1- कामना- यदि मृत्य के समय हमारे मन में किसी वस्तु विशेष के प्रति कोई आसक्ति शेष रह जाती है, कोई इच्छा अधूरी रह जाती है, या कोई अपूर्ण कामना रह जाती है तो मरणोपरांत भी वही कामना उस जीवात्मा के साथ जाती है।

    2- वासना- वासना कामना की ही सहचरी है। वासना का अर्थ केवल शारीरिक भोग से नहीं अपितु इस संसार में भोगे हुए उस प्रत्येक सुख से है जो उस जीवात्मा को आनन्दित करता रहा है। फिर चाहे वो घर हो, पैसा हो, गाड़ी हो, रूतबा हो, या शौर्य। मृत्यु के बाद भी ये अधूरी वासनाएं मनुष्य के साथ ही जाती हैं और मोक्ष प्राप्ति में बाधक होती है।

    3- कर्म- मृत्यु के बाद हमारे द्वारा किए गए कर्म चाहे वो सुकर्म हो अथवा दुष्कर्म हमारे साथ ही जाते हैं। मरणोपरांत जीवात्मा अपने द्वारा किए गए कर्मो की पूँजी भी साथ ले जाता है। जिस के हिसाब किताब द्वारा उस जीवात्मा का यानी हमारा अगला जन्म निर्धारित किया जाता है।

    4- ऋण- यदि मनुष्य ने अपने जीवन में कभी भी किसी प्रकार का ऋण लिया हो तो उस ऋण को यथासम्भव उतार देना चाहिए, ताकि मरणोपरांत इस लोक से उस ऋण को उस लोक में अपने साथ न ले जाना पड़े।

    5- पुण्य- हमारे द्वारा किये गए दान-दक्षिणा व परमार्थ के कार्य ही हमारे पुण्यों की पूंजी होती है इसलिए हमें समय-समय पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा एवं परमार्थ और परोपकार अवश्य ही करने चाहिए।

    इन्हीं पांच वस्तुओं से ही मनुष्य को इस मृत्युलोक को छोड़ कर परलोक जाने पर उस लोक अथवा अगले जन्म की प्रक्रिया का चयन किया जाता है..!

    *आचार्य हर्षमणि बहुगुणा 

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